प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
भारत के इतिहास के इस पहलू को न समझने का कारण कुछ बहुत ही गलत धारणाएं हैं जो काफी प्रचलित हैं। यह आमतौर पर मान लिया गया है कि भारत की एक ही संस्कृति रही है और सारे इतिहास में यही मिलती है, ब्राह्मणवाद, बौद्ध धर्म और जैन धर्म इसके विभिन्न पहलू हैं और इनमें परस्पर कोई मूल विरोध नहीं रहा है। दूसरी धारणा यह कि भारतीय राजनीति में जो भी झगड़े व लड़ाइयां देखने के लिए मिलती हैं, उनका आधार केवल राजनीति और वंशगत बैर आदि रहा है, और इनका कोई भी सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व नहीं रहा । इन्हीं गलत धारणाओं के कारण भारत का इतिहास जड़वत हो गया और एक वंश का अभिलेख मात्र बनकर रह गया। इस प्रवृत्ति या इस प्रकार इतिहास लिखने के तरीकों में तभी सुधार आ सकता है, जब इन दो तथ्यों को स्वीकार कर लें जिनके बारे में कोई विवाद नहीं है।
सबसे पहली बात तो यह स्वीकार कर लेनी चाहिए कि एक समान भारतीय संस्कृति जैसी कोई चीज कभी नहीं रही और यह कि भारत तीन प्रकार का रहा - ब्राह्मण भारत, बौद्ध भारत और हिंदू भारत । इनकी अपनी-अपनी संस्कृतियां रहीं। दूसरी बात यह स्वीकार की जानी चाहिए कि मुसलमानों के आक्रमण के पहले भारत का इतिहास ब्राह्मणवाद और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के बीच परस्पर संघर्ष का इतिहास रहा है। जो कोई इन दो तथ्यों को स्वीकार नहीं करता, वह भारत का सच्चा इतिहास कभी नहीं लिख सकता, ऐसा इतिहास जो उस युग के अर्थ और उद्देश्य को स्पष्ट कर सके। भारत का इतिहास जिस प्रकार लिखा गया, उसे सुधारने और बीते युग का अर्थ और उद्देश्य स्पष्ट करने की भावना से प्रेरित होकर मैं बौद्ध भारत पर ब्राह्मण भारत के आक्रमण और बौद्ध धर्म पर ब्राह्मणवाद की राजनैतिक विजय का इतिहास फिर से लिख रहा हूं।
इसलिए हम इस तथ्य को स्वीकार कर अपनी बात शुरू करेंगे कि पुष्यमित्र की क्रांति राजनैतिक क्रांति थी, जिसकी योजना ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म को निकाल बाहर करने के लिए तैयार की थी।
जिज्ञासु सहज ही यह पूछेगा कि ब्राह्मणवाद ने विजयी होने के बाद क्या किया? मैं अब इसी प्रश्न को लेता हूं। विजय के दर्प से फूले इस ब्राह्मणवाद के कृत्यों अथवा दुष्कृत्यों की सूची सात शीर्षकों में बनाई जा सकती है - (1) इसने ब्राह्मणों को शासन करने और राजहत्या करने का अधिकार प्रदान किया, (2) इसने ब्राह्मणों को विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों का वर्ग बनाया, (3) इसने वर्ण को जाति में बदल दिया, (4) इसने विभिन्न जातियों के बीच संघर्ष और समाज-विरोधी भावना पैदा की, (5) इसने शूद्रों और स्त्रियों को हेय माना, और (6) इसने वर्ण-असमानता की प्रणाली को थोप दिया, और (7) इस सामाजिक व्यवस्था को कानूनी और कट्टर बना दिया जो पहले पारंपरिक और परिवर्तनशील थी ।
हम पहले शीर्षक से शुरू करते हैं।
पुष्यमित्र ने जिस क्रांति का सूत्रपात किया, उसने शुरू में ब्राह्मणों के लिए कठिनाई पैदा कर दी। लोग आसानी से इस क्रांति के साथ समझौता नहीं कर सके । जनता के विरोध को बाण' कवि ने बहुत अच्छी तरह व्यक्त किया है । वह इस क्रांति का उल्लेख करते हुए पुष्यमित्र की, उसे अधम जाति में पैदा हुआ बताकर, आलोचना करता है और उसके द्वारा की गई राजहत्या को अनार्य, अर्थात् आर्य नियम के विरुद्ध बताता है । पुष्यमित्र की क्रांति के आरम्भ होने तक तीन बातों पर आर्य नियम पूर्ण रूप से स्पष्ट थे। तत्कालीन आर्य
1. हर्ष चरित, स्मिथ (1924) द्वारा उद्धृत पू. 208
नियमों में इस बात का स्पष्ट विधान था कि (1) राजा होने का अधिकार केवल क्षत्रिय का है, कोई ब्राह्मण राजा नहीं हो सकता, (2) कोई भी ब्राह्मण आयुधों का व्यवसाय नहीं करेगा', और (3) राजा के विरुद्ध विद्रोह पाप है। पुष्यमित्र ने विद्रोह को संरक्षण देकर इन व्यवस्थाओं में प्रत्येक के विरुद्ध पाप किया है। वह ब्राह्मण था । उसने ब्राह्मण होते हुए राजा के विरुद्ध विद्रोह किया। उसने आयुधों का व्यवसाय अपनाया और वह राजा बन बैठा। सामान्य-जन उसके इस कार्य से असंतुष्ट था जो नियम विरुद्ध था। ब्राह्मणों को पुष्यमित्र द्वारा उत्पन्न इस परिस्थिति को विनियमित करना पड़ा। ब्राह्मणों ने यह कार्य सारी व्यवस्था में परिवर्तन कर पूरा किया। व्यवस्था में यह परिवर्तन मनुस्मृति में बहुत ही स्पष्ट दिखाई देता है। मैं मनुस्मृति में से संबंधित श्लोकों को यहां उद्धृत कर रहा हूं:
12.100. राज्य में सेनापति का पद, शासन के अध्यक्ष का पद, प्रत्येक के ऊपर शासन करने का अधिकार ब्राह्मण के योग्य है।
यहां हम नियम में एक परिवर्तन देखते हैं। नया नियम यह घोषित करता है कि ब्राह्मण को सेनापति बनने, किसी राज्य को जीतने, उस राज्य का शासक और उसका राजा बनने का अधिकार है।
11.31. नियमों को अच्छी तरह जानने वाले ब्राह्मण को किसी दुःखदायी आघात की स्थिति में राजा से शिकायत करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि वह अपनी शक्ति द्वारा ही उस व्यक्ति को दण्ड दे सकता है और उसे आघात पहुंचाता है।
11.32. उसकी निजी शक्ति जो केवल उसी पर निर्भर करती है, राजकीय शक्ति से प्रबल होती है जो कि दूसरे व्यक्तियों पर निर्भर है। अतः ब्राह्मण अपनी शक्ति के द्वारा ही अपने शत्रुओं का दमन कर सकता है।
11.261-62. कोई भी ब्राह्मण जिसने चाहे तीनों लोकों के मनुष्यों की हत्याएं क्यों न की हों, उपनिषदों के साथ-साथ ऋक्, यजु या सामवेद का तीन बार पाठ कर सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
1. यह नियम इतना कठोर था कि आपस्तम्ब धर्म सूत्र के अनुसार, 'कोई भी ब्राह्मण अपने हाथों में आयुध नहीं ग्रहण करेगा, चाहे वह उसकी जांच क्यों न करना चाहता हो।' अतः पुष्यमित्र ने, जो कि ब्राह्मण था ऐसा कार्य किस प्रकार किया, यह आश्चर्य की बात है क्योंकि इन परिस्थितियों में यह कार्य वही कर सकता था जो वीर जाति का हो। इसे हरप्रसाद शास्त्री ने बहुत अच्छी तरह स्पष्ट किया है। उनके अनुसार, शुंग यद्यपि ब्राह्मण था, तथापि वह वीर जाति का था। युद्धशील ब्राह्मणों में दो ब्राह्मण शेष ब्राह्मणों से पृथक थे, विश्वामित्र और भारद्वाज । विश्वामित्र की पत्नी बांझ होने से, एक भारद्वाज से प्राचीन प्रथा 'नियोग' के अनुसार विश्वामित्र के लिए पुत्र पैदा करने के लिए कहा गया। इससे शुंग पैदा हुआ। वह एक गोत्र का जनक बना। इस गोत्र ने सामवेद का अध्ययन करना शुरू किया। शुंग का गोत्र द्वैमुश्य गोत्र कहा गया, अर्थात् दो गोत्रों, विश्वामित्र और भारद्वाज, दोनों ने युद्ध को अपना व्यवसाय चुना। देखें, बुद्धिस्टिक स्टडीज (सं. लॉ.), अध्याय 34, पृ. 820.
यहां नियम में दूसरा परिवर्तन किया गया है। यह ब्राह्मण को न केवल राजा की हत्या, बल्कि जन-सामान्य में नर संहार करने का भी अधिकार देता है, बशर्ते वह उसकी शक्ति और पद को क्षति पहुंचाते हों।
8.348. यदि किसी द्विज के कर्तव्य को बलपूर्वक किया जाता है या उन पर विपत्ति आती है या उनके दुर्दिन आते हैं तो वे शस्त्र उठा सकते हैं।
9.320. यदि कोई क्षत्रिय ब्राह्मण के विरुद्ध सभी अवसरों पर हिंसक ढंग से शस्त्र उठाता है, तो उसे स्वयं वह ब्राह्मण ही दंड देगा क्योंकि क्षत्रिय मूलतः ब्राह्मण से ही पैदा हुआ है।
यह तीसरा वैधानिक परिवर्तन है। यह विद्रोह करने और राजहत्या करने के अधिकार को मान्यता देता है। यह नया नियम बड़ी ही कुशलतापूर्वक बनाया गया है। यह विद्रोह करने का अधिकार तीन उच्च वर्गों को देता है। लेकिन यह अधिकार ब्राह्मणों को दिया गया और इसके लिए ऐसी परिस्थिति की व्यवस्था की गई, जिसके रहते विद्रोह में क्षत्रिय और वैश्य, ब्राह्मण का सहभागी न बन सकें। विद्रोह करने के अधिकार को भली प्रकार परिसीमित किया गया। इस अधिकार का प्रयोग केवल ऐसी दशा में होगा, जब राजा विभिन्न वर्गों के लिए मनु द्वारा निर्दिष्ट व्यवसायों में उलट-फेर करने का दोषी हो ।
यह नियम-परिवर्तन जितने आवश्यक थे, उतने ही क्रांतिकारी । इनका उद्देश्य उस स्थिति को अधिनियमित और नियमित करना था जो पुष्यमित्र ने अंतिम मौर्य राजा की हत्या कर उत्पन्न की थी। इन विधिक परिवर्तनों के होने से कोई भी ब्राह्मण राजा बन सकता था, आयुध ग्रहण कर सकता था, किसी भी राजा को राजगद्दी से उतार या उसकी हत्या कर सकता था, जो चातुर्वर्ण्य का विरोधी हो और किसी भी व्यक्ति की हत्या कर सकता था, जो ब्राह्मण की सत्ता का विरोध करता हो । मनु ने ब्राह्मणों को नर-संहार का अधिकार दे दिया, बशर्ते यह उनके हितों की रक्षा करने के लिए आवश्यक हो जाए।
इस प्रकार ब्राह्मणवाद ने शासन करने के ब्राह्मण के अधिकार को सुस्थापित कर दिया और इस संबंध में जो भी शंकाएं और विवाद थे, उन सबको दूर कर दिया। लेकिन यह समूचे ब्राह्मण वर्ग के लिए कोई लाभ की बात न थी । यदि ब्राह्मण - शासन में किसी ब्राह्मण के साथ गैर-ब्राह्मणों की तरह सामान्य जन जैसा व्यवहार किया जाए और उसको उन जैसे अधिकार और कर्त्तव्य प्राप्त हों, तब कोई खास अंतर नहीं कहा जा सकता था । यदि ब्राह्मण - शासन को अपने अस्तित्व के बारे में कोई औचित्य सिद्ध करना था, तब उसे ब्राह्मणों के समस्त वर्ग को विशेषाधिकार और विशेष रियायत देनी चाहिए थी । यदि पुष्यमित्र की क्रांति में ब्राह्मणों की श्रेष्ठता स्वीकार न की गई होती और उन्हें विशेष सुविधाएं न प्रदान की गई होतीं, तब निश्चय ही वह असफल हो जाती। मनु इससे पूरी तरह परिचित था और इसीलिए उसने, जैसा कि मनुस्मृति से स्पष्ट है, ब्राह्मणों के लिए कुछ एकाधिकार निश्चित किए और कुछ विशेष रियायतें और विशेषाधिकार स्वीकृत किए। पहले एकाधिकारों को लीजिए:
1.88. ब्राह्मणों के लिए उसने (वेद) पढ़ना और पढ़ाना अपने तथा दूसरों के लाभ के लिए यज्ञ करना और कराना, दान देना और लेना कर्म निर्धारित किए हैं।
10.1. तीन प्रकार की द्विज जातियां (वर्ण) अपने-अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करने के साथ-साथ (वेद का) अध्ययन करें, लेकिन इनमें से (केवल ) ब्राह्मण वेद पढ़ावें, दूसरे को वर्ण नहीं पढ़ावें, यह एक सुस्थापित सत्य है ।
10.2. लोगों की आजीविका के जो भी साधन धर्म द्वारा निश्चित किए गए हैं, उन्हें ब्राह्मण को जानना चाहिए, तदनुरूप वह दूसरों को निर्देश दे और स्वयं भी धर्म के अनुसार जीवनयापन करें।
10. 3. जाति की विशिष्टता से उत्पत्ति स्थान की श्रेष्ठता से, अध्ययन एवं व्याख्यान आदि द्वारा नियम के धारण करने से और यज्ञोपवीत संस्कार आदि की श्रेष्ठता से ब्राह्मण ही सब (वर्णों) का स्वामी है।
10.74. ऐसे ब्राह्मण जो उत्कृष्ट देवत्व प्राप्त करने के इच्छुक हैं और अपने कर्त्तव्य के प्रति दृढ़ हैं, वे निम्नांकित छह कार्यों को क्रमानुसार पूर्णरूपेण निष्पादित करें।
10.75. वेदों का अध्ययन करना, दूसरों को वेदों का अध्ययन कराना, अपने लिए एवं दूसरों को यज्ञ में सहायता करना, दान देना और दान लेना, ये छह कार्य ब्राह्मण के लिए निर्दिष्ट हैं।
10.76. परंतु उसके लिए (ब्राह्मण के लिए) इन धर्म निर्दिष्ट छह कार्यों में से तीन कार्य उसकी आजीविका के साधन हैं, अर्थात् अन्य के लिए यज्ञ कर्म, अध्यापन और सदाचारी व्यक्तियों से दान लेना ।
10.77. ब्राह्मणों और क्षत्रियों में से क्षत्रियों के लिए वे तीन कर्म वर्जित हैं जो ब्राह्मणों के लिए निर्दिष्ट हैं, अर्थात् अध्यापन, अन्य के लिए यज्ञ-कर्म और तीसरा, दान स्वीकार करना ।
10.78. वे कार्य इसी प्रकार वैश्य के लिए वर्जित हैं, यह निश्चित सत्य है, क्योंकि मनु ने, जो प्रजापति हैं, इन दोनों जातियों के व्यक्तियों के लिए इन्हें निर्दिष्ट नहीं किया है।
10.79. आजीविका के रूप में आयुध से आक्रमण करने और उसे फेंक कर मारने का कार्य क्षत्रियों के लिए निर्दिष्ट है, व्यापार करना, पशुपालन और कृषि कार्य वैश्यों के लिए निर्दिष्ट हैं। लेकिन उदारता, वेदों का अध्ययन और यज्ञ-कर्म करना उनके कर्त्तव्य हैं।
यहां तीन कार्य ऐसे हैं, जिन पर मनु ने ब्राह्मणों का एकाधिकार निश्चित किया है: ये कार्य हैं, वेदों का अध्ययन, यज्ञ-कर्म और दान लेना ।
ब्राह्मणों को जो छूट दी गई, वह निम्नलिखित है। इसकी कोटियां हैं कर से मुक्ति और अपराध करने पर अपराधी को दिए जाने वाले दंड के कुछ रूप।
7.133. चाहे कोई राजा (अपूर्ण इच्छा ग्रस्त होकर) मर भी क्यों न रहा हो, तब भी उसे श्रोत्रियों पर कोई कर नहीं लगाना चाहिए और उसके राज्य में रह रहे किस भी श्रोत्रिय की भूख से मृत्यु नहीं होनी चाहिए।
8.122. वे घोषित करते हैं कि विज्ञों ने ये आर्थिक दंड मिथ्या साक्ष्य देने वालों के लिए निर्धारित किए हैं, जिससे न्याय व्यवस्था असफल न हो और जिससे अन्याय को रोका जा सके।
8.123. लेकिन न्यायप्रिय राजा तीन निचली जातियों (वर्णों) के व्यक्तियों को आर्थिक दंड देगा और उन्हें निष्कासित कर देगा, जिन्होंने मिथ्या साक्ष्य दिया है, लेकिन ब्राह्मण को वह केवल निष्कासित करेगा ।
8.124. स्वयंभू के पुत्र मनु ने ऐसे दस स्थान बताए हैं जहां निचली तीन जातियों के वर्णों के मामले में दंड दिया जा सकता है। लेकिन ब्राह्मण ( उस देश से ) अक्षत निर्वासित हो जाएगा।
8.379. ब्राह्मण के लिए मृत्यु दंड के स्थान पर उसका सिर मुंडा देना निश्चित किया गया है, लेकिन अन्य जातियों (के लोगों) को मृत्यु दंड भुगतना होगा ।
8.380. वह किसी भी ब्राह्मण की कभी भी हत्या न करे, चाहे उस ब्राह्मण ने कितने भी अपराध किए हों, उसे ऐसे अपराधी को देश से अपनी संपत्ति सहित और सकुशल चले जाने देना चाहिए।
इस प्रकार मनु ब्राह्मण को गंभीरतम अपराधों के लिए निर्धारित सामान्य दंड विधान से ऊपर रखता है। मृत्यु-दंड के लिए उसके अपराधों के सिद्ध होने पर भी उसे सकुशल और अपनी संपत्ति सहित देश से निकल जाने की स्वीकृति देता है। उसे आर्थिक दंड या मृत्यु-दंड से बरी रखता है। उसे केवल देश निष्कासन का दंड भोगने देता है। जघन्यतम अपराध करने पर इस स्थिति को होब्स ने केवल 'वातावरण में परिवर्तन' की संज्ञा दी है।
मनु ने ब्राह्मण को कुछ विशेषाधिकार दिए हैं। न्यायाधीश ब्राह्मण होना चाहिए :
8.9. परंतु यदि राजा अभियोगों की जांच स्वयं नहीं करता, तब उसे इन अभियोगों पर विचार करने के लिए विद्वान ब्राह्मण की नियुक्ति करनी चाहिए।
8.10. ऐसा व्यक्ति उस श्रेष्ठतम न्यायालय में तीन निर्धारकों के साथ आएगा और राजा के सम्मुख समस्त कारणों पर बैठकर या खड़े होकर, पूर्ण विवेचन करेगा।
अन्य विशेषाधिकार आर्थिक थे :
8.37. जब किसी विद्वान ब्राह्मण को कोई निधि मिल गई हो और उसने उसे उसी भांति जमा कर दिया हो, तब वह उस संपूर्ण निधि को ले सकता है, क्योंकि वह प्रत्येक वस्तु का स्वामी है।
8.38. जब राजा को भूमि में गड़ी कोई पुरानी निधि मिल जाए, तब उसे उसका आधा भाग ब्राह्मणों को दे देना चाहिए। और शेष आधा भाग अपने राजकोष में जमा कर देना चाहिए।
9.323. परंतु (जो राजा यह अनुभव करता है कि उसका अंत निकट आ रहा है ) उसे अपना समस्त धन, जो दंड आदि से एकत्र हुआ हो, ब्राह्मणों को दान कर देना चाहिए, अपना राज्य अपने पुत्र को सौंप देना चाहिए और युद्ध क्षेत्र में वीर गति प्राप्त करनी चाहिए।
9.187. मृतक की संपदा सपिंड को मिलेगी जो तीन पीढ़ियों में आता हो और दिवंगत के सबसे निकट हो, इसके बाद उसका एक भाग ( उत्तराधिकारी को, उसके बाद) आध्यात्मिक गुरु या शिष्य को मिलेगा।
9.188. परंतु किसी भी उत्तराधिकारी के न होने पर ऐसे ब्राह्मण उसे आपस में बांट लेंगे जो तीनों वेदों में पारंगत हों, पवित्र और संयमी हों, इस प्रकार विधि का उल्लंघन नहीं होता है।
9.189. ब्राह्मण की संपत्ति राजा द्वारा कभी भी नहीं ली जानी चाहिए, यह एक निश्चित नियम है, लेकिन अन्य जाति के व्यक्तियों की संपत्ति उनके उत्तराधिकारियों के न रहने पर राजा ले सकता है।
ये वे सुविधाएं, रियायतें और विशेषाधिकार हैं, जो मनु ने ब्राह्मणों को दिए। ये इस बात के प्रतीक हैं कि ब्राह्मण किस प्रकार राजा बन जाता है।