अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
त्रिशंकु की यह कथा 'हरिवंश' में प्राप्त उसकी कथा से जो नीचे उद्धृत है, मूलतः भिन्न है, लेकिन उससे वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच संघर्ष के स्वरूप की बड़ी ही स्पष्ट जानकारी मिलती है।
जब यज्ञ की पूर्णाहुति होने पर सभी देवता तथा ऋषि विदा हो गए तो विश्वामित्र ने अपने अनुचर भक्तों से कहा, 'इस दक्षिण दिशा में हमारी तपस्या में महान विघ्न हुआ है, अतः हम अब दूसरी दिशा में चलें और वहीं रहकर तपस्या करेंगे।' तद्नुसार वह पश्चिम के एक वन में चले गए और पुनः तपस्या करने लगे।
यहां पर एक नई कथा का वर्णन प्रारंभ हो जाता है। वह कथा अयोध्या नरेश अंबरीष की है, जो 'रामायण' के अनुसार इक्ष्वाकु के 28वें तथा त्रिशंकु के 22वें वंशज थे। कहा जाता है कि विश्वामित्र इन दोनों राजाओं से समकालीन थे। कथा में कहा गया है।
जब अंबरीश यज्ञ में लग हुए थे तो इंद्र ने उनके यज्ञ - पशु को चुरा लिया । पुरोहित ने कहा कि यह अशुभ घटना राजा के कुशासन के कारण हुई है और अगर यज्ञ - पशु नहीं खोज लिया जाता, तो नर बलि देनी पड़ेगी। खोजते खोजते राजर्षि अंबरीश ब्रह्मर्षि भृगु के वंशज ऋचीक के पास पहुंचे और उनसे याचना की कि वह एक लाख गायें लेकर अपने एक पुत्र को बलि के लिए दे दें। ऋचीक ने कहा कि वह अपना ज्येष्ठ पुत्र नहीं देंगे, और उनकी पत्नी ने कहा कि वह अपना कनिष्ठ पुत्र नहीं देंगी। पत्नी ने कहा कि जयेष्ठतम पुत्र प्रायः अपने पिता का और कनिष्ठतम पुत्र अपनी मां का लाडला होता है। तब मझले पुत्र शुनःशेप ने कहा, 'उस दशा में मैं समझता हूं कि मझला पुत्र ही दिए जाने योग्य है। अत: तुम मुझे ले चलो।' तब एक करोड़ स्वर्ण मुद्रा, रत्नों के ढेर तथा एक लाख गायें दी गईं और शुनःशेप को लेकर चल दिए। जब वे पुष्कर से गुजर रहे थे तो शुनःशेप ने अपने मामा विश्वामित्र को देखा, जो अन्य ऋषियों के साथ वहां तप कर रहे थे। वह यह कहकर उनकी गोद में गिर पड़ा कि वह अनाथ, मित्ररहित और असहाय, ऋषि की दया का पात्र है और उसने उनसे सहायता की याचना की। विश्वामित्र ने उसे धीरज बंधाया और अपने पुत्रों से आग्रह किया कि वे शुनःशेप के स्थान पर बलि के लिए जाए। इस पर राजर्षि के मधुष्यांद आदि पुत्रों ने असहमति व्यक्त की और उदंडता और तिरस्कारपूर्वक बोले, 'यह कैसा आचरण है कि आप अपने पुत्रों की बलि और दूसरे के पुत्रों की रक्षा कर रहे हैं। हम इसे अकर्तव्य समझते हैं और यह अपना मांस खाने जैसा ही है।' अपनी आज्ञा की अवमानना होते देख मुनि अत्यंत क्रुद्ध हो गए और उन्होंने पुत्रों को शाप दे दिया, 'जाओ वशिष्ठ के पुत्रों की भांति तुम्हारा जन्म भी एक सहस्त्र वर्षों तक अत्यंत नीच जाति में हो और तुम कुत्ते का मांस खाओ।' फिर उन्होंने शुनःशेप से कहा, जब तुम्हें अंबरीश के यज्ञ में कुश आदि के पवित्र पाशों में बांध तुम्हारे ऊपर लाल रंग की माला डाल और चंदन का लेप कर विष्णु के यज्ञ स्तंभ से बांध दिया जाए, तब तुम अग्नि को संबोधित कर इन दो दिव्य गाथाओं का गान करना। इससे तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी।' दोनों गाथाएं प्राप्त करते ही शुनःशेप ने राजा अंबरीश से तुरंत गंतव्य की ओर प्रस्थान करने के लिए कहा। जब शुनःशेप को लाल वस्त्र पहना कर बलि के लिए स्तंभ से बांध दिया गया, तब उसने इंद्र और उनके छोटे भाई (विष्णु) की स्तुति की। सहस्त्रक्षि ( इंद्र) गुप्त मंत्रों को सुन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने शुनःशेप की दीर्घायु प्रदान की। राजा अंबरीष को भी इस यज्ञ के फलस्वरूप भारी पुण्यों की प्राप्ति हुई। इसके बाद विश्वामित्र पुनः अपनी तपस्या में लग गए और एक हजार वर्ष तक घोर तप करते रहे।
एक हजार वर्ष पूरे होने पर देवता विश्वामित्र के पास उन्हें तपस्या का फल देने के लिए आए। ब्रह्मा ने घोषणा की कि उन्होंने ऋषि का पद उन्नति स्परूप प्राप्त कर लिया है। स्पष्टतः मुनि इससे संतुष्ट नहीं हुए और पुनः तपस्या में लग गए। इस प्रकार वह बहुत समय तक तपस्या करते रहे। एक बार इसी बीच उन्होंने अप्सरा मेनका को देखा, जो पुष्कर झील में स्नान करने के लिए आई हुई थी। वह उसके सौंदर्य पर मुग्ध हो गए। वह अपूर्व लावण्यमयी थी, जैसे बादलों में बिजली हो। उन्होंने उसे अपने आश्रम में साथ रहने के लिए बुला लिया। वह दस वर्ष तक मेनका के सम्मोहन से ग्रस्त रहे। इससे उनकी तपस्या में महान विघ्न पड़ा। वह अपनी इस अधम स्थिति पर बड़े लज्जित हुए। वह यह सोचकर कि यह सब मेरी तपस्या भंग करने के लिए देवताओं की चाल है, क्रुद्ध हो उठे। फिर उन्होंने समझा-बुझा कर अप्सरा को विदा किया और वह उत्तरी पर्वतमाला पर चले गए, जहां उन्होंने कौशिकी नदी के तट पर एक हजार वर्ष तक घोर तपस्या की। वह अपनी तपस्या में जो प्रगति कर रहे थे, उसे देखकर देवता भयभीत हो उठे। उन्होंने विश्वामित्र को महर्षि की पदवी देने का निर्णय किया। ब्रह्मा ने प्रायः सभी देवताओं की ऐसी इच्छा को ध्यान में रख उन्हें महर्षि का पदवी घोषित कर दी। विश्वामित्र हाथ जोड़ प्रणाम करके बोले, 'जब मुझे ब्रह्मर्षि का अनुपम पद प्रदान किया जाएगा, तभी मैं अपने आपको जितेंद्रिय समझंगा ।' तब ब्रह्मा ने उनसे कहा, 'तुमने अभी अपनी इंद्रियों को पूरा तरह अपने वश में करने की शक्ति नहीं प्राप्त की है। इसके लिए और प्रयास करो।' तब विश्वामित्र ने पुनः और भी घोर तपस्या प्रारंभ कर दी। वह दोनों भुजाएं ऊपर उठाकर बिना किसी आधार के खड़े होकर केवल वायु पीकर तथा ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि ( अर्थात् एक-एक चारों दिशाओं और सिर पर सूर्य) के बीच, वर्षाकाल में खुले आकाश के नीचे और जाड़ों में दिन-रात पानी में खड़े रहकर तप करने लगे। इस प्रकार उन्होंने एक हजार वर्षों तक लगातार घोर तपस्या की। अंततः इंद्र और अन्य देवता विश्वामित्र को इस प्रकार पुण्य और तेज का संग्रह करते देख संत्रस्त हो उठे और देवताओं के राजा इंद्र ने अप्सरा रंभा से मुनि को अपने रूप तथा हाव-भाव से लुब्ध करने के लिए कहा। रंभा ने विकट स्वभाव के मुनि के क्रोध से सामने जाने से आनाकानी की, लेकिन इंद्र के बार-बार आग्रह करने पर वह तैयार हो गई। इंद्र ने वचन दिया कि वह और कंदर्प (प्रेम के देवता) भी उसके साथ रहेंगे। मुनि ने इस षडयंत्र को ताड़ लिया और अति कुपित होकर अप्सरा को शाप दे दिया कि वह एक हजार वर्षों तक पत्थर बन कर रहे। शाप प्रभावी हो गया और कंदर्प तथा इंद्र वहां से लज्जित हो खिसक लिए। इस प्रकार भले ही मुनि ने काम के प्रलोभन का तो प्रतिरोध कर लिया, पर क्रोध से तपस्या का पूर्णतः क्षय हो गया। उन्हें तप पुनः प्रारंभ करना पड़ा। उन्होंने निश्चय किया कि जब तक उन्हें मनचाहा ब्राह्मत्व प्राप्त नहीं होगा, तब तक वह ने तो क्रोध करेंगे और न किसी भी अवस्था में मुंह से कुछ बोलेंगे, सौ वर्षों तक श्वास भी नहीं लेंगे और अपने शरीर को सुखा डालेंगे। वह तब हिमालय पर्वत को छोड़ पूर्व की ओर चले गए। वहां प्रतिज्ञा के अनुसार उन्होंने एक हजार वर्षों तक मौन रहकर भंयकर तप किया, जैसा कि किसी ने नहीं किया था। अब तक उन्हें पूर्णत्व प्राप्त हो चुका था और अनेक बाधाओं के बावजूद वह कभी क्रुद्ध नहीं हुए थे। व्रत समाप्त होने पर उन्होंने अपने लिए भोजन तैयार किया, जिसे इंद्र ने ब्राह्मण वेश में आकर मांगा। तद्नुसार विश्वामित्र ने वह अन्न उन्हें दे दिया। उस अन्न में से कुछ भी नहीं बचा और उन्हें भूखा रहना पड़ा। फिर भी उन्होंने ब्राह्मण से कुछ नहीं कहा। उन्होंने अपने व्रत का यथार्थ रूप से पालन किया। इसके बाद पुनः वह श्वास-रहित मौन व्रत में लीन हो गए। सांस न लेने के कारण उनके मस्तक से धुंआ उठने लगा । इससे तीनों लोकों के प्राणी थर्रा उठे। इससे त्रस्त होकर देवताओं और ऋषियों आदि ने ब्रह्मा से कहा, 'देव ! अनेक प्रकार से महामुनि विश्वामित्र को लोभ और क्रोध दिलाने की चेष्ठ की गई, किंतु वह और भी निर्मल होते जा रहे हैं। यदि उनकी इच्छा पूरी नहीं की गई तो वे अपनी तपस्या से तीनों लोकों को नष्ट कर डालेंगे। सभी दिशाओं में अंधकार छा रहा है, कहीं भी प्रकाश नहीं है, समुद्र शुब्ध हो उठा है, सारे पर्वत चकनाचूर हुए जाते हैं, धरती कांप रही है और प्रचंड आंधी चलने लगी है। हे ब्रह्मा ! हम इस बात की गारंटी नहीं दे सकते कि मानव-जाति नास्तिक नहीं होगी। अतः इससे पहले कि यह महान और तेजस्वी मुनि अग्नि के रूप में (सब-कुछ) भस्म कर देंगे, उन्हें प्रसन्न किया जाए।' तब ब्रह्मा सभी देवताओं को अपने साथ लेकन विश्वामित्र के पास जाकर बोले- 'ब्राह्मण ऋषि, तुम्हारी जय हो। हम तुम्हारी तपस्या से अति प्रसन्न हुए। हे कौशिक, तुमने अपनी गहन तपस्या से ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया है। हे ब्राह्मण, मरुद्गणों सहित मैं तुम्हें दीर्घायु, प्रदान करता हूं। तुम्हारा हर प्रकार से कल्याण हो। जहां तुम्हारी इच्छा हो, वहां तुम जाओ।' मुनि ने प्रसन्न होकर समस्त देवताओं को पणाम किया और कहा, 'देवगण ! यदि मुझे ब्राह्मणत्व और दीर्घायु प्राप्त हो गई है तो एकाक्षर ओंकार, वषट्कार और वेद मुझे इस रूप मे स्वीकार करें, और ब्रह्मा के पुत्र वशिष्ठ जो छात्र- वेद तथा ब्रह्म-वेद (क्षत्रिय और ब्राह्मण विधाओं के ज्ञाता) हैं, मुझे इस रूप में संबोधित करें।' देवताओं के अनुरोध पर वशिष्ठ ने विश्वामित्र के साथ संधि कर ली और उन्हें ब्रह्मर्षि होने का अधिकारी मान लिया।.... विश्वामित्र ने भी ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त कर वशिष्ठ को पूर्ण सम्मान दिया।
दूसरी घटना का संबंध क्षत्रियों द्वारा ब्राह्मणों की हत्या से है। उसका उल्लेख 'महाभारत' के ‘आदि पर्व' में है। निम्न विवरण वहीं से उद्धृत है :
एक बार कृतवीर्य नामक एक राजा थे। उनकी तपस्या से वेद-मर्मज्ञ भृगुवंशी जो उनके पुरोहित होते थे, धन-धान्य से आपूरित हो उठे। राजा के स्वर्गवासी होने पर उनके वंशजों को धन की जरूरत पड़ी। उन्होंने धनवान भृगुवंशियों से धन की याचना की। क्षत्रियों के डर से कुछ भृगुवंशियों ने अपना धन जमीन में गाड़ दिया, कुछ ने उसे ब्राह्मणों को दान दे दिया, पर कुछ अन्य ने क्षत्रियों को उनकी इच्छानुसार दिया। एक बार एक क्षत्रिय को भूमि खोदते समय एक भृगु के घर में कुछ धन गड़ा हुआ मिल गया। तब सभी क्षत्रिय एकत्र हुए और उन्होंने यह खजाना देखा। वह कुपित हो उठे। उन्हें भृगुवंश से घृणा हो गई। उन्होंने सभी भृगुवंशियों की, यहां तक कि जो गर्भस्थित शिशुओं के रूप में थे, उनकी भी हत्या कर दी। किसी तरह विधवाएं भागकर हिमालय पर्वत पर चली गईं। उनमें से एक ने अपना अजन्मा शिशु अपनी जंघा में छिपा लिया। एक ब्राह्मणी मुखबिर से क्षत्रियों को जब उस शिशु का पता चला तो उन्होंने उसी भी मार डालने का प्रयास किया, लेकिन वह अपार तेज - सहित अपनी माता की जंघा से पैदा हुआ और उसने हत्यारों को अंधा कर दिया। कुछ समय तक पर्वतों में विमूढ़ों की भांति भटकने के बाद उन्होंने विनयपूर्वक शिशु की माता से याचना की कि उनकी दृष्टि लौटा दी जाए। लेकिन माता ने कहा, 'जाओ, मेरे अलौकिक पुत्र और्व के पास जाओ। उसके भीतर वेदव्यास - सहित संपूर्ण वेदों का वास है। उसी ने अपने संबंधियों की हत्या के प्रतिशोध में तुम्हारी दृष्टि का हरण कर लिया है। वही तुम्हारी दृष्टि को वापस कर सकता है।' तद्नुसार वे उसकी शरण में गए और उनकी दृष्टि उन्हें पुनः वापस मिल गई। लेकिन और्व ने भृगुवंशियों की हत्या के प्रतिशोध में सभी चेतन प्राणियों के विनाश का निश्चय किया और उसके लिए तपस्या करने लगा। उससे सभी देव असुर तथा मानव थर्रा उठे। लेकिन तभी उसके पितृगण स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने उससे तपस्या से विमुख होने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि वे नहीं चाहते कि क्षत्रियों से प्रतिशोध लिया जाए। उन्होंने कहा कि धर्ममाता भृगुवंशियों ने क्षत्रियों से उनके द्वारा की गई हत्या का प्रतिशोध किसी कमजोरी के कारण नहीं लिया था। जब हम बुढ़ापे से तंग आ गए, तो हमने स्वयं यह इच्छा की कि वे हमारी हत्या कर दें। उस भृगुवंशी के घर में जिस किसी ने धन गाड़ दिया था, उसका प्रयोजन क्षत्रियों को भड़काना था। हम तो स्वर्ग की कामना कर रहे थे, हमें धन से क्या लेना-देना था? उन्होंने कहा कि उन्होंने यह युक्ति इसलिए अपनाई कि वे आत्महत्या का पाप मोल नहीं लेना चाहते थे। उन्होंने और्व से आग्रह किया कि वह अपने क्रोध पर नियंत्रण करे और उस पाप को न करे, जो वह अपने मन में संजोए हुए है। उन्होंने कहा, 'वत्स ! क्षत्रियों का विनाश न करो। तीनों लोकों का भी विनाश न करो। अपनी उस क्रोधाग्नि को शांत करो, जो तपोबल को नष्ट कर देती है।' लेकिन और्व ने उत्तर दिया, 'मैं अपने निश्चय को अधूरा नहीं छोड़ सकता। मेरी क्रोधाग्नि यदि किसी वस्तु को भस्म नहीं करेगी तो वह मुझे ही भस्म कर देगी। वह उस दया - भावन का जिसकी उसके पितृगणों ने शिक्षा दी थी, न्याय, अनिवार्यता और कर्तव्य के आधार पर विरोध करता है।' तब उसके पितृगणों ने उससे अनुरोध किया कि वह अपनी क्रोधाग्नि को समुद्र में फेंक दे, जहां वह जलतत्व को उद्वेलित करती रहेगी और इस प्रकार तुम्हारी प्रतिज्ञा भी पूर्ण हो जाएगी।