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अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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18 ऑक्टोबर 2023
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करोड़ों की आबादी को नकारने का प्रयास


     I. अस्पृश्यों की संख्या काफी समय तक अज्ञात रही,

     II. सन् 1911 की जनगणना और पृथक गणना का पहला प्रयास,

     III. सन् 1911 की जनगणना के निष्कर्षों की पुष्टि,

     IV. लोथियन कमेटी और हिंदुओं का कोई 'अस्पृश्य नहीं' का नारा, V. इस नारे के कारण, और

     VI. पिछड़े वर्गों तथा मुस्लिमों का रवैया ।


I

     भारत के अस्पृश्यों की कुल आबादी कितनी है ? जो व्यक्ति इन लोगों के बारे में कुछ जानना चाहेगा, उसका निश्चय ही पहला सवाल यही होगा। अब तो इस सवाल का जवाब आसानी से दिया जा सकता है। 1931 की भारत की जनगणना के अनुसार उनकी आबादी पांच करोड़ थी। जहां अब यह संभव है कि भारत में अस्पृश्यों की आबादी के बारे में कमोबेश सही आंकड़े दिए जा सकें, वहीं पहले काफी समय तक ऐसा करना संभव नहीं था ।

Karodo Ki Aabadi Ko Nakarne Ka Prayas Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by Dr Babasaheb Ambedkar

     इसके अनेक कारण थे। पहला कारण तो यह था कि अस्पृश्यता कोई कानूनी शब्द नहीं है। अस्पृश्यता की ऐसी कोई सटीक कानूनी परिभाषा नहीं है कि उसके द्वारा यह परिभाषित किया जा सके कि कौर अस्पृश्य है और कौन नहीं है। अस्पृश्यता एक सामाजिक धारणा है, जिसने एक प्रथा का रूप ले लिया है और चूंकि प्रथा का अलग-अलग रूप होता है, अतः वही दशा अस्पृश्यता की है। इसलिए इस बारे में सदा ही कुछ-न-कुछ कठिनाई आ रही है कि निश्चित गणितीय मापदंड के अनुसार अस्पृश्यों की आबादी का आकलन किया जा सके। दूसरे, स्वर्ण हिंदू सदा ही इस बात का तीव्र विरोध करते रहे हैं कि जनगणना रिपोर्ट के लिए जाति के अनुसार गणना की जाए। उनका आग्रह रहा है कि अनुसूचियों के लिए जाति संबंधी सवाल को न उठाया जाए और जाति तथा जनजाति के आधार पर जनसंख्या का वर्गीकरण न किया जाए। 1901 की जनगणना के बारे में इसी आशय का प्रस्ताव किया गया था। उसका मुख्य आधार था कि जनसंख्या में विभिन्न जातियों तथा जनजातियों का विभाजन लंबे अंतरालों के बाद बदलता है और यह जरूरी नहीं है कि हर दस साल के बाद होने वाली जनगणना में उनके आंकड़े प्राप्त किए जाएं।

     जनगणना आयुक्त पर आपत्ति के इन आधारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। आयुक्त के विचार में जाति के अनुसार गणना महत्वपूर्ण और आवश्यक थी। जनगणना आयुक्त की दलील थी :

     सामाजिक संस्था के रूप में जाति के गुण-दोषों के बारे में चाहे कुछ भी कहा जाए, परंतु यह स्वीकार करना असंभव है कि भारत में जनसंख्या संबंधी समस्या पर कोई भी विचार-विमर्श जिसमें जाति एक महत्वपूर्ण मुद्दा न हो, लाभप्रद हो सकता है। भारतीय समाज का ताना-बाना अभी जाति-व्यवस्था पर आधारित है और भारतीय समाज के विभिन्न स्तरों में परिवर्तन का निर्धारण अभी भी जाति के आधार पर होता है। प्रत्येक हिंदू (यहां इसका प्रयोग व्यापक अर्थ में किया जा रहा है) जाति में जन्म लेता है, उसकी वह जाति ही उसके धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, और पारिवारिक जीवन का निर्धारण करती है। यह स्थिति मां की गोद से लेकर मृत्यु की गोद तक रहती है। पश्चिमी देशों में समाज के विभिन्न स्तरों का निर्धारण, चाहे वह आर्थिक हो, शैक्षिक हो या व्यावसायिक हो, जिन प्रधान तत्वों के द्वारा होता है, वे अदलते - बदलते रहते हैं, वे उदार होते हैं और उनमें जन्म और वंश की कसौओ को बदलने की प्रवृत्ति होती है। भारत में आध्यात्मिक, सामाजिक, सामुदायिक तथा पैतृक व्यवसाय सबसे बड़े तत्व हैं, जो अन्य तत्वों की अपेक्षा प्रधान तत्व होते हैं। इसलिए पश्चिमी देशों में जहां जनगणना के समय आर्थिक अथवा व्यावसायिक वर्ग के आधार पर आंकड़े एकत्र किए जाते हैं, वहां भारत में जनगणना के समय धर्म और जाति का ध्यान रखा जाता है। राष्ट्रव्यापी और सामाजिक संस्था के रूप मे जाति के बारे में कुछ भी क्यों न कहा जाए, इसकी उपेक्षा करने से कोई लाभ नहीं होगा और जब तक समाज में किसी व्यक्ति के अधिकार और उसके पद की पहचान जाति के आधार पर की जाती रहेगी, तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि हर दस साल के बाद होने वाली जनगणना से इस अवांछनीय संस्था के स्थाई होते जाने में सहायता मिलती है।

     सन् 1911 की जनगणना के अवसर पर जनगणना में जाति के अनुसार गणना किए जाने पर और अधिक जोरदार तरीके से आपत्तियां उठाई गई। उस समय दस कसौटियों वाली एक विशेष प्रश्नावली जारी की गई। उद्देश्य यह था कि इन कसौटियों को पूरा करने वाली जातियों का एक समूह बना दिया जाए। इसमें संदेह नहीं कि ये ऐसी कसौटियां थीं, जो दलित वर्गों की सवर्ण हिंदुओं से अलग करती थीं। सवर्ण हिंदुओं को आशंका थी कि यह परिपत्र भारत मंत्री (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट) के नाम मुस्लिम ज्ञापन का नतीजा था और इसका उद्देश्य दलित वर्गों को हिंदुओं से अलग कर देना था, ताकि हिंदू समाज की संख्या और उसकी महत्ता को कम कर दिया जाए।

     यह प्रतिरोध निष्फल रहा और उन दस कसौटियों को पूरा करने वाली जातियों की गणना जनसंख्या रिपोर्ट में अलग से करने के उद्देश्य को पूरा किया गया। लेकिन प्रतिरोध पूर्णतः शांत नहीं हुआ। 1921 की जनगणना के समय वह पुनः उभरा। इस अवसर पर औपचारिक रीति से जातीय विवरणी पर आपत्ति उठाने का प्रयास किया गया। 1920 में सम्राट की विधायिका ( इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल) में एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। इसमें जाति संबंधी पूछताछ की आलोचना की गई। आलोचना के आधार थे (क) जातिभेद की प्रथा को सरकारी प्रयास द्वारा मान्यता देना और बनाए रखना वांछनीय नहीं है, और (ख) विवरणियां गलत और व्यर्थ हैं, क्योंकि निम्न जातियों ने स्वयं को उच्चतर स्तर के समूहों के रूप में प्रदर्शित करने के अवसर का लाभ उठाया है। यदि यह प्रस्ताव पारित हो जाता है तो अस्पृश्यों की संख्या की जानकारी पाना संभव न हो पाता। सौभाग्य से प्रस्तावक की अनुपस्थिति के कारण प्रस्ताव पर चर्चा नहीं हुई और 1921 का जनगणना आयुक्त सामान्य रीति से अपनी जांच करने के लिए स्वतंत्र रहा।

     तीसरे, 1921 से पहले किसी भी जनसंख्या आयुक्त ने अस्पृश्यों की अलग से गणना करने का कोई प्रयास नहीं किया। भारत में पहली बार आम जनगणना 1881 में हुई थी। 1881 की जनसंख्या रिपोर्ट में भारत की कुल जनगणना करने के लिए यहां की प्रजातियों की सूची बनाने और उनका कुल योग करने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया गया। इस रिपोर्ट में विभिन्न हिंदू जातियों का उच्च या निम्न अथवा स्पृश्य या अस्पृश्य जातियों के रूप में कोई वर्गीकरण नहीं किया गया। भारत की दूसरी आम जनगणना 1891 में हुई। इस जनगणना में पहली बार जनगणना आयुक्त ने जनसंख्या को जाति, प्रजाति और उच्च या निम्न जाति के रूप में वर्गीकृत करने की कोशिश की।

     भारत की तीसरी आम जनगणना 1901 में हुई थी। इस जनगणना में वर्गीकरण का एक नया सिद्धांत अपनाया गया, अर्थात् 'देशी जनमत द्वारा मान्य सामाजिक पूर्वता के आधार पर वर्गीकरण।' हिंदू समाज जैसे समाज के लिए यह सिद्धांत सर्वाधिक उपयुक्त सिद्धांत था, क्योंकि वह समता को स्वीकार नहीं करता और उसकी समाज-व्यवस्था उच्चतर तथा निम्नतर के श्रेणीकरण की व्यवस्था है। भारतीय जनता का जो विशाल वर्ग प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जाति के आधार पर संगठित है, उसके सामाजिक जीवन और समूहन का जितना सुस्पष्ट चित्र सामाजिक पूर्वता का यह सिद्धांत प्रस्तुत कर सकता है, उतना अन्य कोई नहीं कर सकता ।