अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
II
जनगणना आयुक्त ने स्पष्ट रूप से तथा समझ-बूझकर अस्पृश्यों की संख्या सुनिश्चित करने का प्रथम प्रयास 1911 में किया। 1911 की जनगणना से ठीक पहले का समय ऐसा था, जब मार्ले-मिंटो सुधार प्रारंभिक अवस्था में थे। यह वह समय था, जब भारत के मुसलमानों ने पृथक निर्वाचक मंडलों के जरिए विधान-मंडलों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व पाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया था। अपने प्रचार के अंग के रूप में मुसलमानों का प्रतिनिधि मंडल कौंसिल में तत्कालीन भारत मंत्री लार्ड मार्ले से मिला और उसने उन्हें 27 जनवरी, 1909 को एक ज्ञापन प्रस्तुत किया। उस ज्ञापन में कहा गया ( बयान मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में दर्ज नहीं है – संपादक) ।
सन् 1907 में अस्पृश्यों के बारे में मुस्लिम प्रतिनिधि मंडल ने अपने ज्ञापन में जो आग्रह किया, उसका कोई संबंध चार वर्ष बाद से अस्पृश्यों की अलग से गणना करने के जनगणना आयुक्त के विचार से है या नहीं, यह एक ऐसा मामला है, जिसके बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि जनसंख्या आयुक्त ने 1911 में जिस कार्य का प्रस्ताव रखा, वह केवल उन उपायों की चरम परिणति हो, जिन्हें उसके पूर्व के आयुक्तों ने जनसंख्या के अध्ययन के लिए अपनाया। जो भी हो, हिंदुओं ने उस समय भारी हंगामा किया, जब जनगणना आयुक्त ने अस्पृश्यों की अलग से गणना करने की अपनी योजना का एलान किया। ऐसा कहा गया है कि जनगणना आयुक्त का यह प्रयास उस साजिश का नतीजा था, जिसे हिंदू समाज में फूट डालने और उसे निर्बल बनाने के लिए मुसलमानों तथा अंग्रेजों ने रची थी। कहा गया कि इस प्रयास के पीछे यह सच्ची कामना नहीं थी कि अस्पृश्यों की संख्या मालूम की जाए, बल्कि यह कामना थी कि स्पृश्यों से अस्पृश्यों की संख्या को अलग करके हिंदू समाज की एकजुटता को भंग कर दिया जाए। हिंदुओं ने देश-भर में प्रतिरोध में अनेक सभाएं कीं और जनगणना आयुक्त की इस योजना की कठोरतम शब्दों में निंदा की।
तथापि, प्रतिरोध के इस तूफान से विचलित हुए बिना जनगणना आयुक्त ने अपनी योजना को पूरा करने का निश्चय किया। इसमें संदेह नहीं कि अस्पृश्यों की अलग से गणना करने का जो तरीका उन्होंने अपनाया, वह अनोखा था । जनगणना आयुक्त ने विभिन्न प्रातों के जनगणना अधीक्षकों को अनुदेश दिया कि जिन जातियों तथा जनजातियों का वर्गीकरण हिंदुओं के रूप में किया गया है, पर जो कतिपय मापदंडों को पूरा नहीं करतीं अथवा जो कतिपय निर्योग्यताओं से ग्रस्त हैं, उनकी गणना अलग से की जाए।
इन कसौटियों के अनुसार जनगणना अधीक्षकों ने उन जातियां तथा जनजातियों की अलग से गणना की : (1) जो ब्राह्मणों की श्रेष्ठता नहीं मानते, (2) जो किसी ब्राह्मण या अन्य मान्यता हिंदू से गुरु दीक्षा नहीं लेते, (3) जो वेदों की सत्ता स्वीकार नहीं करते, (4) जो बड़े-बड़े हिंदू देवी-देवताओं की पूजा नहीं करते, (5) ब्राह्मण जिनकी यजमानी नहीं करते, (6) जिनका कोई ब्राह्मण पुरोहित बिल्कुल भी नहीं होता, (7) जो साधारण हिंदू मंदिरों के गर्भ गृह में प्रवेश नहीं कर सकते, ( 8 ) जिनसे छूत लगती है, (9) जो अपने मुर्दों को दफनाते हैं, और ( 10 ) जो गोमांस खाते हैं, और गाय की पूजा नहीं करते ।
जनगणना आयुक्त की छानबीन ने अटकल की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी। उन्होंने तथ्यतः यह मालूम कर लिया की अस्पृश्यों की आबादी कितनी थी । 1911 के जनगणना आयुक्त की खोज के अनुसार प्रांतवार अस्पृश्यों की संख्या निम्न सारणी में दशाई गई है¹ :
| प्रांत |
कुल आबादी |
दलित वर्गों की |
कुल |
दलित वर्गों |
| मद्रास | 39.8 | 6.3 | 120 | 2 |
| बंबई | 19.5 | 0.6 | 113 | 1 |
| बंगाल | 45.0 | 9.9 | 127 | 1 |
| संयुक्त प्रांत | 47.0 | 10.1 | 120 | 1 |
| पंजाब | 19.5 | 1.7 | 85 | - |
| बिहार तथा उड़ीसा | 32.4 | 9.3 | 100 | 1 |
| मध्य प्रदेश | 12.0 | 3.7 | 72 | 1 |
| असम | 6.0 | 0.3 | 54 | - |
| 221.2 | 41.9 | 791 | 7 |
1. यह सारणी इस ग्रंथ-माला के खंड 4, पृ. 75 से पुनः मुद्रित की गई है। मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में यह दर्ज नहीं है - संपादक।
हो सकता है कि बाहर वाला कोई व्यक्ति इन कसौटियों की महत्ता और प्रभाव को न समझ पाए। वह पूछ सकते हैं कि इस सबका अस्पृश्यता से क्या लेना-देना है। लेकिन अस्पृश्यों की आबादी सुनिश्चित करने से संबंधित प्रश्न के संदर्भ में उनकी महत्ता और प्रभाव को वह समझ पाएगा। जैसा कि बताया जा चुका है, अस्पृश्यता की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है और कोई परिभाषा हो भी नहीं सकती। अस्पृश्यता स्वयं को सिर के बाल या चमड़ी के रंग द्वारा व्यक्त नहीं कर सकती। इसका रक्त से कोई संबंध नहीं है । कतिपय प्रथाओं के पालन और व्यवहार के तरीकों में अस्पृश्यता परिलक्षित होती है। अस्पृश्य वह व्यक्ति है, जिसके साथ हिंदू एक निश्चित प्रकार का व्यवहार करते हैं और जो हिंदुओं से भिन्न कतिपय रीति-रिवाजों का पालन करता है। सामाजिक मामलों में अस्पृश्यों के साथ हिंदू निश्चित प्रकार का व्यवहार करते हैं। अस्पृश्य उन निश्चित प्रथाओं का पालन करते हैं। जब स्थिति यह है तो कौन अस्पृश्य है, इसका पता लगाने का केवल यह तरीका है कि उनके रीति-रिवाजों को कसौटी माना जाए और यह पता लगाया जाए कि कौन-सी जातियां उनका पालन करती हैं। अन्य कोई उपाय है ही नहीं। यदि बाहर वाला व्यक्ति इस बात को ध्यान में रखता है तो वह समझ पाएगा कि यद्यपि जनगणना आयुक्त द्वारा निर्धारित कसौटियां अस्पृश्यता का कोई रंग नहीं दर्शातीं, फिर भी तथ्य यह है कि वे अस्पृश्यता के प्रमाण चिह्न हैं। जब स्थिति यह है तो इस बारे में कोई संदेह नहीं रह सकता कि प्रक्रिया उचित थी और कसौटियां खरी थीं। अतः यह कहना सही होगा कि जहां तक इस प्रकार के मामले हो सकते हैं, इस छानबीन के नतीजे महत्वपूर्ण थे और प्राप्त आंकड़े सही थे ।