मुख्य मजकुराकडे जा

अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 34 of 52
18 ऑक्टोबर 2023
Book
5,,7,1,13,,

III

     अस्पृश्यों की कुला आबादी के बारे में 1911 के जनगणना आयुक्त के निष्कर्षों की पुष्टि 1921 के जनगणना आयुक्त ने की।

     सन् 1921 के जनगणना आयुक्त ने अस्पृश्यों की आबादी को सुनिश्चित करने के लिए छानबीन भी की। इस रिपोर्ट के भाग I में जनगणना आयुक्त ने कहा है :

Karodo Ki Aabadi Ko Nakarne Ka Prayas Rajniti Politics Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     हाल के वर्षों में समाज के कतिपय वर्ग को 'दलित वर्ग' कहने का रिवाज सा हो गया है। जहां तक मुझे मालूम है 'दलित वर्ग' शब्द की कोई अंतिम परिभाषा नहीं है, और न ही निश्चित रूप से इससे यह पता चलता है कि कौन-कौन उसके अंतर्गत आता है। 1912/17 तक की शिक्षा संबंधी प्रगति के बारे में पंचवर्षीय समीक्षा (अध्याय 18 पैरा 505) में शिक्षा - सहायता तथा प्रगति की दृष्टि में दलित वर्गों पर विशेष रूप से विचार किया गया है। उस रिपोर्ट के परिशिष्ट XIII में एक सूची दी गई है। उसमें इस समुदाय के इस वर्ग की जातियों तथा जनजातियों का उल्लेख किया गया है। इस सूची के अनुसार दलित के रूप में वर्गीकृत कुल आबादी तीन करोड़ दस लाख अथवा ब्रिटिश भारत की हिंदू जनजातीय आबादी का 29 प्रतिशत बताई गई है। इसमें संदेह नहीं कि एक सरकारी रिपोर्ट में संभवतः आपत्तिजनक लगने वाले सामाजिक विभेद को प्रकाशित करने में अप्रसन्नता का कुछ जोखिम है, लेकिन यह तथ्य है कि सूचियां प्रकाशित हो चुकी हैं और विशेषत: दक्षिण भारत में दलित वर्गों में वर्ग चेतना और वर्ग-संगठन पैदा हो चुका है, और उनकी सेवा वे विशेष मिशन कर रहे हैं, जिन्हें परोपकारी संस्थाओं ने खड़ा किया है तथा जिन्हें अधिकृत रूप से विधान-मंडलों में प्रतिनिधित्व प्राप्त है। इस तथ्य को देखते हुए निश्चय ही यह उचित दीख पड़ता है कि तथ्यों का सामना किया जाए और उनकी संख्या के बारे में आंकड़ों का कुछ आकलन प्राप्त किया जाए। अतः मैंने प्रांतीय अधीक्षकों से कहा कि वे मेरे सामने एक आकलन प्रस्तुत करें। मैंने उनसे कहा कि आकलन में उन जातियों की कमोबेश सही संख्या के लिए जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाए, जिन्हें आमतौर पर दलित की श्रेणी में शामिल किया गया है।

      मुझे सभी प्रांतों तथा राज्यों से किसी-न-किसी प्रकार की सूचियां प्राप्त हुई, पर संयुक्त प्रांत इसका अपवाद रहा। वहां की सरकारी मनोदशा की छुईमुई नजाकत ने मोटा अनुमान देने की कोशिश भी गवारा नहीं की । दिए गए आंकड़े सही तथा समान कसौटियों पर आधारित नहीं हैं, क्योंकि भारत के अलग-अलग हिस्सों में एक जैसे समूहों की स्थिति के बारे में अलग दृष्टि अपनाई जाती है। अतः कुछ मामलों में मुझे आकलनों में संशोधन करना पड़ा। इसके लिए मैंने शिक्षा संबंधी रिपोर्ट के आंकड़ों और 1911 की रिपोर्ट तथा सारणियों की सूचना को आधार बनाया। वे भी इस पूर्वोक्त सामान्य त्रुटि से ग्रस्त हैं कि किसी जाति की कुल संख्या दर्ज नहीं की गई है। लेकिन विवरण इस बारे में मोटा अनुमान दे देता है कि वह कौन - सी 'न्यूनतम' संख्या है, जिसे हिंदू समाज का 'दलित वर्ग' माना जा सकता है। इन प्रांतीय आंकड़ों का कुल जोड़ पांच करोड़ तीस लाख से लगभग बैठता है। लेकिन इसे भी एक निम्न तथा अनुदार आकलन मानना होगा । इसमें (1) संबद्ध जातियों और जनजातियों की कुल संख्या नहीं दी गई है, और (2) न ही उसमें उन आदिम जातियों के लोगों की संख्या दी गई है, जो अभी हाल में हिंदू धर्म में शामिल हुए हैं और जिनमें अनेक को अपवित्र माना जाता है। हम निश्चय के साथ कह सकते हैं कि दलित वर्गों को अपवित्र माना जाता है, उन सबकी संख्या भारत में ही साढ़े पांच और छह करोड़ के बीच होगी।

     फिर साइमन कमीशन ने जांच की। इस कमीशन को 1929 में ब्रिटिश संसद ने नियुक्त किया। उससे कहा गया कि वह 1919 के भारत सरकार के अधिनियम के अधीन लागू किए गए सुधारों के कार्य की जांच करे और अन्य सुधारों का सुझाव दें।

     उस समय जब उन सुधारों पर चर्चा हो रही थी जिन्हें बाद में 1919 के अधिनियम में शामिल किया गया, मोंटेग्यू-चेम्सफोड रिपोर्ट तैयार करने वालों ने स्पष्टतः अस्पृश्यों की समस्या को स्वीकार किया। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे विधान-मंडलों में उनके प्रतिनिधित्व के लिए सर्वोत्तम व्यवस्था करेंगे। लेकिन लार्ड साउथबरो की अध्यक्षता में मताधिकार तथा मतदान प्रणाली सुझाने के लिए जो कमेटी नियुक्त की गई, उसने उनकी पूर्ण उपेक्षा की। पर भारत सरकार ने उसकी इस उपेक्षा का अनुमोदन नहीं किया और निम्न टिप्पणी की

     वे (अस्पृश्य) कुल आबादी का पांचवां भाग हैं और उन्हें मार्ले-मिंटों कौंसिलों में कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है। कमेटी की रिपोर्ट में उनका (अस्पृश्यों के रूप में) दो बार उल्लेख किया गया है, लेकिन केवल यह जताने के लिए कि संतोषजनक निर्वाचन क्षेत्र न होने की दशा में उनके लिए नाम निर्देशन की व्यवस्था कर दी गई है। उसमें यह उल्लेख नहीं किया गया है कि इन लोगों की स्थिति क्या है और उनमें स्वयं अपनी देखरेख करने की कितनी क्षमता है। न ही उसमें यह बताया गया है कि उसने इन लोगों के लिए कितने नामांकन का सुझाव दिया है... कितने प्रतिनिधित्व का प्रस्ताव किया है। उसने सुझाव दिया कि ब्रिटिश भारत की कुल आबादी के पांचवें भाग के लिए लगभग आठ सौ सीटों में से सात सीटें अलॉट की जाएं। यह सच है कि सभी कौंसिलों में अधिकारियों का लगभग छठा भाग ऐसा होगा, जिनसे यह आशा की जा सकती है कि वे (अस्पृश्यों) के हितों का ध्यान रखेंगे, पर हमारी राय में सुधारों संबंधी रिपोर्ट का यह लक्ष्य नहीं है। रिपोर्ट तैयार करने वालों ने कहा कि (अस्पृश्यों) को भी आत्मरक्षा का पाठ पढ़ना चाहिए। निश्चय ही, यह कैसी बेतुकी आशा है कि एक ऐसी विधायिका में जहां साठ-सत्तर सवर्ण हिंदू हों, इस समुदाय के एक अकेले प्रतिनिधि को शामिल करके वह नतीजा हासिल किया जा सकेगा। यदि रिपोर्ट के सिद्धांतों को सार्थक बनाना है, तो हमें बहिष्कृतों के प्रति और अधिक उदार व्यवहार करना ही होगा।

     सरकार ने सिफारिश की कि कमेटी ने अस्पृश्यों के लिए जितनी सीटें अलॉट की हैं, उनकी संख्या को दुगना कर दिया जाए । तदनुसार सात के स्थान पर उन्हें चौदह सीटें दी गई। हम देखेंगे कि यदि व्यवहार की कसौटी पर हम भारत सरकार की उदारता को परखें, तो वह नगण्य सी है। निश्चय ही वह अस्पृश्यों को समुचित न्याय प्रदान नहीं करती।

    जिन समस्याओं का 1919 में समुचित समाधान नहीं किया गया, उनमें अस्पृश्यों की समस्या भी थी, जो साइमन कमीशन के सामने सुरसा बन कर खड़ी हो गई। अति अप्रत्याशित रूप से लार्ड बर्कनहेड (दिवंगत ) ने इस समस्या पर विशेष बल दिया। वह उस समस्त भारत मंत्री थे। साइमन कमीशन की नियुक्ति से ठीक पूर्व ....¹ को दिए गए एक वक्तव्य में उन्होंने कहा (मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में स्थान खाली छोड़ दिया गया है – संपादक) ।

    स्वाभाविक है कि समस्या साइमन कमीशन के लिए एक विशेष कठोर कर्म बन गई। भले ही यथा प्रस्तुत समस्या प्रतिनिधित्व देने की थी और उस अर्थ में राजनीतिक समस्या थी, पर वास्तव में समस्या यह थी कि अस्पृश्यों की संख्या सुनिश्चित की जाए। क्योंकि जब तक संख्या सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक यह तय नहीं किया जा सकता था कि विधान मंडल में कितना प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाए।

     अतः साइमन कमीशन को अस्पृश्यों की संख्या के बारे में सूक्ष्म जांच करनी पड़ी। उसने विभिन्न प्रांतीय सरकारों से आग्रह किया कि वे अपने क्षेत्र में बसे अस्पृश्यों की संख्या के बारे में विवरणियां प्रस्तुत करें। कौन नहीं जानता कि इन विवरणियों को तैयार करते समय प्रांतीय सरकारों ने विशेष सावधानी बरती। अतः अस्पृश्यों की कुल संख्या के सही होने के बारे में कोई शंका नहीं हो सकती । निम्न सारणी² अस्पृश्यों की आबादी के आंकड़े उस रूप में दिए गए हैं, जिस रूप में वे साउथबरो कमेटी तथा साइमन कमीशन को प्राप्त हुए ।


1. मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में तिथि नहीं दी गई है।
2. मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में सारणी नहीं दी गई है।