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अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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18 ऑक्टोबर 2023
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IV

     अतः यह स्पष्ट है कि अस्पृश्यों की आबादी पांच करोड़ के आसपास आंकी गई है। अस्पृश्यों की इतनी आबादी है, इसका पता 1911 के जनगणना आयुक्त ने लगाया । उसकी पुष्टि 1921 के जनगणना आयुक्त ने तथा 1929 में साइमन कमीशन ने की। बीस साल तक यह तथ्य रिकार्ड में दर्ज रहा। उस बीच किसी भी हिंदू ने उसे कभी भी चुनौती नहीं दी। वास्तव में हिंदू दृष्टिकोण को उन विभिन्न कमेटियों की रिपोर्टों के आधार पर मापा जाए, जिन्हें साइमन कमीशन के सहयोग से करने के लिए प्रांतीय तथा केंद्रीय विधान-मंडलों ने नियुक्त किया था, तो इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि उन्होंने इस आंकड़े को बिना किसी आपत्ति के स्वीकार किया ।

Karodo Ki Aabadi Ko Nakarne Ka Prayas Census of India Rajniti Politics Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     लेकिन 1932 में जब लोथियन कमेटी बनी और उसने जांच-पड़ताल शुरू की तो अचानक हिंदुओं ने चुनौती भरा रुख अपनाया और उसने इन आंकड़ों को सही मानने से इंकार कर दिया। कुछ प्रांतों में तो हिंदुओं ने यहां तक कहा कि वहां तो कोई अस्पृश्य है कि नहीं। यह घटना हिंदुओं की मनोवृत्ति को दर्शाती है। अतः वांछनीय है कि उस पर कुछ विस्तार से चर्चा की जाए ।

     लोथियन कमेटी की नियुक्ति भारतीय गोलमेज सम्मेलन की मताधिकार संबंधी उप-समिति की सिफारिशों के फलस्वरूप की गई थी। कमेटी ने समूचे भारत का दौरा किया और मध्य प्रांत तथा असम को छोड़कर शेष सभी प्रांतों की यात्रा की। कमेटी की मदद के लिए प्रांतीय सरकार ने हर प्रांत में प्रांतीय कमेटियों का गठन किया। उनमें यथासंभव हर प्रांत में मौजूद विभिन्न विचारधाराओं के विभिन्न राजनीतिक हितों के प्रवक्ता शामिल किए गए। इन प्रांतीय कमेटियों में मुख्य प्रांतीय कौंसिलों के सदस्य थे। उनका अध्यक्ष गैर-सरकारी लोगों को बनाया गया। चर्चा को केंद्रित करने के लिए भारतीय मताधिकार कमेटी ने एक प्रश्नावली जारी की। प्रश्नावली विचारार्थ विषय के क्षेत्र पर आधारित थी । मताधिकार कमेटी ने यह प्रक्रिया निर्धारित की कि प्रांतीय सरकारें प्रश्नावली में उठाए गए मुद्दों पर अपने निजी दृष्टिकोण निर्धारित करें और उनके बारे में कमेटी से चर्चा करें। प्राधिकृत सलाहकार के रूप में मान्य प्रांतीय कमेटियां स्वतंत्र रूप से अपने दृष्टिकोण निर्धारित करें और स्व-विवेक से साक्षियों के लिखित बयानों के आधार पर प्रारंभिक पड़ताल करें। अतः भारतीय मताधिकार कमेटी की रिपोर्ट विस्तृत पड़ताल पर आधारित पूर्ण दस्तावेज है।

     प्रधानमंत्री ने भारतीय मताधिकार कमेटी के अध्यक्ष लार्ड लोथियन को एक अनुदेश - पत्र भेजा था। उसमें कमेटी के विचारार्थ विषय का उल्लेख था । उसमें यह विचार व्यक्त किया गयाः

     (भारतीय गोलमेज सम्मेलन) में विभिन्न मुद्दों के बारे में जो चर्चाएं हुईं, उनसे स्पष्ट हो गया है कि नए संविधान में दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व के बारे में पर्याप्त व्यवस्था करनी होगी और अब नामांकन द्वारा प्रतिनिधित्व की पद्धति को उपयुक्त नहीं माना जाता है। जैसा कि आपको मालूम ही है, इस बारे में मतभेद है कि दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचक मंडलों की व्यवस्था की जाए या नहीं। अतः आपकी कमेटी की जांच-पड़ताल से इस प्रश्न के निर्णय की दिशा में योगदान मिलना चाहिए। यह बताएं कि आपकी सिफारिश के अनुसार मताधिकार के सामान्य विस्तार के जरिए किस हद तक दलित वर्ग सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में मताधिकार प्राप्त कर सकेंगे। दूसरी ओर, यदि यह निश्चय किया जाए कि दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचक मंडलों का गठन या तो सामान्यतः या फिर उन प्रांतों में किया जाए जहां आबादी में उसका स्पष्ट तथा अलग अंश है, तो आपकी कमेटी मताधिकार के विस्तार की सामान्य समस्या की पड़ताल करें और ऐसे तथ्य हासिल करे, जिससे दलित वर्गों के लिए अलग प्रतिनिधित्व का तरीका खोजने में सुविधा मिल सके।

    तदनुसार भारतीय मताधिकार कमेटी ने जो प्रश्नावली जारी की, उसमें यह प्रश्न भी शामिल था : 'किन जातियों को आप दलित वर्गों में शामिल करेंगे? क्या आप अस्पृश्यों से इतर वर्गों को शामिल करेंगे, यदि हां तो किन्हें?'

     मैं भारतीय मताधिकार कमेटी का सदस्य था। जब मैं इस कमेटी का सदस्य बना तो मुझे मालूम था कि जिस मुख्य प्रश्न पर मुझे सवर्ण हिंदुओं से जूझना पड़ेगा, वह था अस्पृश्यों के लिए संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र बनाम पृथक निर्वाचक मंडल का प्रश्न । मुझे पता था कि भारतीय मताधिकार कमेटी में अस्पृश्यों के विरोध में स्पृशों का पलड़ा भारी होगा। वहां कमेटी में मैं अस्पृश्यों का अकेला प्रतिनिधि हूंगा, जब कि सवर्ण हिंदुओं के आधा दर्जन प्रतिनिधि होंगे। ऐसे विषम संघर्ष के लिए मैंने स्वयं को तैयार कर लिया था। भारतीय मताधिकार कमेटी की सदस्यता स्वीकार करने से पूर्व मैंने यह शर्त रख दी थी कि अस्पृश्यों के लिए संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र रखे जाएं या पृथक निर्वाचक मंडल, यह प्रश्न कमेटी के विचारार्थ विषय में शामिल न किया जाए। इस शर्त को मान लिया गया और प्रश्न को भारतीय मताधिकार कमेटी के विचार के दायरे से अलग रखा गया। अतः मुझे इस बात का कोई डर नहीं था कि कमेटी में मुझे इस प्रश्न का मतदान में हरा दिया जाएगा। यह एक ऐसी रणनीति थी, जिसके लिए मुझे हिंदु सदस्यों ने क्षमा नहीं किया। लेकिन एक दूसरी ही समस्या उठ खड़ी हुई, जिसका मुझे तनिक भी आभास नहीं था। वह समस्या अस्पृश्यों की संख्या की थी, जिसकी पड़ताल 1911 और 1929 के बीच चार अलग-अलग प्राधिकारियों ने की थी। उन्होंने पाया कि अस्पृश्यों की आबादी कोई पांच करोड़ के लगभग होगी। मुझे इसका कोई आभास नहीं था कि भारतीय मताधिकार कमेटी के सामने इस प्रश्न पर कोई विवाद खड़ा हो जाएगा। भले ही विचित्र लगे, पर यह तथ्य है कि भारतीय मताधिकार कमेटी के सामने संख्या के मसले पर बड़ी कट्टरता से विवाद किया गया और उस पर लंबी खींचातानी हुई। कमेटी की अनगिनत बैठकें हुई और अनगिनत साक्षी हाजिर हुए और उन्होंने अस्पृश्यों के अस्तित्व को नकारा । यह एक विचित्र घटना थी और मुझे उसका सामना करना पड़ा। यह तो संभव नहीं होगा कि उस प्रत्येक साक्षी के बयान का उल्लेख किया जाए, जिसने हाजिर होकर अस्पृश्य जैसे वर्ग के अस्तित्व को नकारा। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए इतना पर्याप्त होगा कि मैं अस्पृश्यों की आबादी के प्रश्न के बारे में प्रांतीय मताधिकार कमेटियों तथा उनके सदस्यों के विचारों का उल्लेख कर दूं।