अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
महाड में चावदार तालाब पर अस्पृश्यों के प्रवेश करने पर जब हिंदुओं ने उन पर आक्रमण किया, तो निस्संदेह वह उनके लिए एक चुनौती बना गया। इसके अलावा अस्पृश्य इस बात के लिए तुले हुए थे कि वे केवल अपने अधिकार के इस्तेमाल से ही संतुष्ट नहीं हो जाएंगे, बल्कि देखेंगे कि वह अच्छी तरह स्थापित भी हो जाएं। उनके लिए यह सोचना स्वाभाविक ही था कि वे हिंदुओं की चुनौती को स्वीकार करें ही। तदनुसार अस्पृश्यों का एक दूसरा सम्मेलन बुलाया गाय । अस्पृश्यों को बताया गया कि वे सत्याग्रह के लिए (अर्थात् सविनय अवज्ञा तथा जेल जाने के लिए भी) पूरी तरह तैयार होकर आएं।
जब हिंदुओं को इसका पता चला तो उन्होंने कोलाबा के जिला मजिस्ट्रेट से आवेदन किया कि वह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के अधीन आदेश जारी कर दें, ताकि अस्पृश्य चावदार तालाब पर जाकर उसके जल को अपवित्र न कर सकें। जिला मजिस्ट्रेट ने मना कर दिया और कहा कि तालाब एक सार्वजनिक तालाब है और सभी नागरिकों के लिए खुला हुआ है, और वह कानून के अनुसार अस्पृश्यों को वहां से पानी लेने से नहीं रोक सकते। मजिस्ट्रेट ने उन्हें सलाह दी कि वे अदालत जाएं और अपने एकमात्र उपभोक्ता होने के अधिकार को सिद्ध करें। यह तय किया गया कि सम्मेलन 25, 26, 27 दिसंबर, 1927 को होगा। तिथियां नजदीक आती गई और उन्होंने सुना कि अस्पृश्य नितांत गंभीर थे। उन्हें यह भी पता था कि जिला मजिस्ट्रेट ने उनकी सहायता करने से इंकार कर दिया था। अतः उनके पास केवल एक ही उपाय रह गया कि वे अपने इस अधिकार को कानून द्वारा सिद्ध करें कि सार्वजनिक तालाब से अस्पृश्य पानी नहीं ले सकते। तदनुसार विभिन्न जातियों के नौ हिंदू वादी बने और उन्होंने मिलकर 12 दिसंबर, 1927 को 1927 का दावा संख्या 405 दायर किया। हिंदुओं के प्रतिनिधियों ने यह दावा महाड के उप-न्यायाधीश की अदालत में दायर किया। अस्पृश्यों के प्रतिनिधि के रूप में मैं तथा चार अन्य लोग प्रतिवादी बने । दावे का उद्देश्य था कि अदालत से यह आदेश प्राप्त किया जाए कि 'उक्त चावदार तालाब केवल स्पृश्य वर्गों की निजी संपत्ति है और अस्पृश्यों को कोई अधिकार नहीं है कि वे उस तालाब पर जाकर वहां से पानी लें। इस बारे में भी स्थाई आदेश दिया जाए कि इनमें से कोई भी कार्य प्रतिवादी नहीं कर सकते।' जिस दिन दावा दायर किया गया, उसी दिन वादियों ने अदालत से आवेदन किया कि प्रतिवादियों के खिलाफ अस्थाई आदेश दिया जाए, ताकि वे मुकदमे के फैसले तक तालाब पर जाकर वहां से पानी न ले सकें। न्यायाधीश ने यह मानकर कि यह एक उपयुक्त केस है 14 दिसंबर, 1927 को मेरे तथा अन्य प्रतिवादियों के खिलाफ अस्थाई निषेधाज्ञा दे दी।
न्यायाधीश द्वारा जारी की गई अस्थाई निषेधाज्ञा बंबई भेजी गई और मुझ पर सम्मेलन होने से दो-तीन दिन पहले तामील की गई। सलाह के लिए कोई समय था ही नहीं और सम्मेलन को स्थगित भी नहीं किया जा सकता था। मैंने निर्णय का मामला सम्मेलन पर छोड़ दिया।
सम्मेलन बुलाने का खास उद्देश्य था कि तालाब से पानी लेने के जिस अधिकार को पिछली बार हिंदुओं ने चुनौती दी, उसे स्थापित किया जाए। जिला मजिस्ट्रेट ने मार्ग को खुला रखा था। लेकिन अब तो न्यायाधीश ने ऐसा कार्यवाही पर रोक का आदेश जारी कर दिया था। स्वाभाविक है कि जब सम्मेलन की बैठक हुई तो उसके विचारार्थ सबसे पहला सवाल यह था कि अदालत द्वारा जारी की गई निषेधाज्ञा को भंग करके तालाब पर प्रवेश किया जाए या नहीं। पहले जो जिला मजिस्ट्रेट अस्पृश्यों के प्रति सहानुभूति रखता था, अब उसने एक भिन्न रवैया अपनाया। सम्मेलन को जब स्वयं आकर मजिस्ट्रेट ने संबोधित किया तो उसने अपने दृष्टिकोण को पूर्णतया स्पष्ट कर दिया। उसने कहा कि यदि दीवानी अदालत ने निषेधाज्ञा जारी न की होती तो वह सवर्ण हिंदुओं की उपेक्षा करके तालाब पर अपने के अस्पृश्यों के प्रयास में उनकी सहायता करता, लेकिन चूंकि उप-न्यायाधीश ने अपना आदेश जारी कर दिया था, अतः उसकी स्थिति भिन्न हो गई है। वह अस्पृश्यों को तालाब पर जाने की अनुमति नहीं दे सकता, क्योंकि ऐसे कार्य का परोक्ष अर्थ होगा कि बिना किसी दंड के सम्राट के न्यायालय के आदेश को भंग करने में उन्हें सहायता दी जाए। अतः उसे लगा कि उसे बाध्य होकर अस्पृश्यों पर रोक लगाने का आदेश जारी करना पड़ेगा, यदि वे निषेधाज्ञा के होते हुए तालाब पर जाने का आग्रह करें। कारण यह नहीं था कि वह हिंदुओं का पक्ष लेना चाहता था, बल्कि यह था कि वह दीवानी अदालत की गरिमा की रक्षा के लिए बाध्य था और उसे देखना था कि आदेश का पालन हो ।
सम्मेलन ने कलेक्टर के कथन पर और हिंदुओं की उस प्रतिक्रिया पर भी विचार किया, जो अदालत से प्राप्त आदेश का उल्लंघन करके तालाब पर जाने के अस्पृश्यों के प्रयास के प्रति हिंदुओं की होती। अंततः सम्मेलन इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि उनकी बेहतरी और सुरक्षा इसी में होगी कि कानून का पालन किया जाए और देखा जाए कि अधिकार प्राप्त करने में वह कहां तक मददगार सिद्ध हो सकता है। अतः निश्चय किया गया कि मुकदमे का अंतिम फैसला होने तक न्यायाधीश के आदेश की सविनय अवज्ञा को स्थगित कर दिया जाए।
सविनय अवज्ञा की कभी नौबत ही नहीं आई, क्योंकि मुकदमें में अस्पृश्यों की जीत और हिंदुओं की हार हुई। जिन कारणों से अस्पृश्यों ने कानून का पालन किया और सविनय अवज्ञा को स्थगित किया, उनमें से एक प्रमुख कारण यह था कि वे इस प्रश्न पर अदालत का निर्णय पाना चाहते थे कि क्या अदालत अस्पृश्यता की प्रथा को वैध ठहरा सकती है? कानून का नियम है कि जिस प्राप्ति को वैध ठहराना हो, उसे अति प्राचीन होना ही चाहिए, उसे निश्चित होना ही चाहिए, उसे ऐसा होना ही चाहिए कि वह नैतिकता अथवा लोक-नीति के प्रतिकूल न हो । अस्पृश्यों का दृष्टिकोण है कि यह ऐसी प्रथा है, जो नैतिकता और लोक-नीति के प्रतिकूल है। लेकिन इसक सार्थकता तभी है, जब कोई न्यायाधिकरण उसके बारे में ऐसी घोषणा करे। अस्पृश्यता की प्रथा को अवैध घोषित करने वाला ऐसा कोई निर्णय निश्चय ही नागरिक अधिकारों के लिए अस्पृश्यों के संघर्ष में अति महत्वपूर्ण सिद्ध होगा, क्योंकि नागरिक मामलों में अस्पृश्यता को लाना अवैध दीख पड़ेगा। चावदार तालाब विवाद में अस्पृश्यों की जीत कोई मामूली जीत नहीं थी। लेकिन एक प्रकार से वह निराशाजनक थी, क्योंकि बंबई उच्च न्यायालय ने इस प्रश्न का निर्णय नहीं किया कि अस्पृश्यता की प्रथा वैध थी या नहीं। उसने मुकदमे का फैसला हिंदुओं के खिलाफ इस आधार पर दिया कि हिंदू यह सिद्ध नहीं कर सके कि तालाब के मामले में उन्होंने जिस प्रथा का हवाला दिया, वह अति प्राचीन थी। उसकी राय थी कि स्वयं प्रथा को सिद्ध नहीं किया जा सका। तालाब अस्पृश्यों के लिए खोल दिया गया। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि अस्पृश्यों ने अपना उद्देश्य प्राप्त कर लिया। मुख्य मुद्दा यह था कि अस्पृश्यता की प्रथा वैध प्रथा थी या नहीं। दुर्भाग्य से उच्च न्यायालय ने उस प्रश्न पर निर्णय नहीं दिया। अतः अस्पृश्यों को अपना संघर्ष जारी रखना पड़ा।