अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
संयुक्त प्रांत जैसे प्रांतों में जमादार यदि सफाई करने से इंकार कर दे, तो उसे अपराध माना जाता है। 1916 के संयुक्त प्रांत नगरपालिका अधिनियम || की धारा 201 में ये उपबंध हैं :
(क) यदि कोई जमादार जिसका किसी घर या भवन की घरेलू सफाई का प्रथागत अधिकार है (इसमें इसके पश्चात् वह प्रथागत जमादार कहलाएगा), उचित ढंग से ऐसी सफाई नहीं करता है, तो घर या भवन का निवासी अथवा बोर्ड मजिस्ट्रेट से शिकायत कर सकता है।
(ख) मजिस्ट्रेट ऐसी शिकायत मिलने पर जांच कराएगा और यदि उसे दीख पड़े कि प्रथागत जमादार ने समुचित ढंग से या उचित अंतराल पर घर या भवन की सफाई नहीं की है, तो वे ऐसे जमींदार पर 10 रुपये तक का जुर्माना कर सकता है और यदि उसी घर या भवन के बारे में दूसरी अथवा बाद की कोई दोषिसिद्ध हो, तो वह यह निर्देश भी दे सकता है कि घर अथवा भवन की घरेलू सफाई का प्रथागत जमादार का अधिकार जब्त कर लिया जाए और उसके फलस्वरूप ऐसा अधिकार जब्त हो जाएगा।
ठीक ऐसा ही उपबंध 1911 के पंजाब नगरपालिका अधिनियम की धारा 165 में पाया जाता है। पंजाब अधिनियम, संयुक्त प्रांत अधिनियम से इस अर्थ में बढ़कर है कि वह उस जमादार के लिए भी दंड की व्यवस्था करता है, जो प्रथागत जमादार न होकर ठेके पर काम करने वाला जमादार होता है। पंजाब अधिनियम में कहा गया है:
(ग) यदि प्रथागत जमादार के अलावा कोई जमादार जो किसी ठेके के अधीन किसी घर या भवन की घरेलू सफाई करता है, अपने नियोजक को 14 दिन का नोटिस दिए बिना अथवा उचित कारण के बिना ऐसी घरेलू सफाई करना बंद कर देता है, जो दोष सिद्ध हो जाने पर उस पर 10 रुपये तक का जुर्माना किया जा सकता है। धारा 165 के अधीन जबती के हर आदेश पर अगली बड़ी अदालत में अपील नहीं की जा सकेगी।
लोगों को यह पढ़कर धक्का लग सकता है कि ऐसा कानूनी उपबंध है, जो बेगार को मान्यता देता है। निस्संदेह यह गुलामी है। गुलामी और स्वतंत्र श्रम में अंतर है। गुलामी के अधीन सेवा संबंधी ठेके तो तोड़ना ऐसा अपराध है, जिसके लिए जुर्माना या जेल की सजा दी जा सकती है। स्वतंत्र श्रम के अधीन सेवा के ठेके को तोड़ना केवल सिविल (दीवानी) दोष है। उसके लिए श्रमिक को केवल हर्जाना देना पड़ेगा । इस कसौटी के अनुसार सफाई का कर्म एक वैध दायित्व है। वह अस्पृश्यों पर थोपा गया है और उससे वे बच नहीं सकते।
इन परिस्थितियों में अस्पृश्यों पर कैसे यह आरोप लगाया जा सकता है कि वे यह घिनौना कर्म अपनी इच्छा से कर रहे हैं।
यह प्रश्न वास्तव में संगत नहीं है कि अस्पृश्यों पर यह आरोप लगाया जा सकता है या नहीं कि हिंदुओं के इस घिनौने कार्य को करके उन्होंने स्वयं अस्पृश्यता के अभिशाप को न्यौता दिया है। उल्लेखनीय बात तो यह है कि महाड में अस्पृश्यों के सम्मेलन ने संकल्प किया कि न तो कोई अस्पृश्य हिंदुओं के मृत पशुओं की खाल उतारेगा, न ही उसे उठाएगा और न उसके सड़े-गले मांस को खाएगा। इन संकल्पों का दोहरा उद्देश्य था । एक तो यह था कि अस्पृश्यों में आत्म-सम्मान और आत्म-प्रतिष्ठा का भाव जगाया जाए। यह गौण उद्देश्य था । प्रमुख उद्देश्य था, हिंदू समाज-व्यवस्था पर करारा प्रहार। हिंदू समाज व्यवस्था श्रम के विभाजन पर टिकी है। वह हिंदुओं के लिए स्वच्छ और सम्मानजनक धंधे आरक्षित करती है और घिनौने तथा घटिया धंधे अस्पृश्यों के मत्थे मढ़ती है। इस प्रकार यह हिंदुओं को यश का भागी बनाती है और अस्पृश्यों को अपयश के गर्त में धकेलती है। संकल्प, हिंदू, समाज-व्यवस्था की इस कुचेष्टा के विरुद्ध विद्रोह था। इनका उद्देश्य था कि हिंदू अपने घिनौने धंधे खुद अपने हाथों से करें।
यह है, हिंदुओं की स्थापित व्यवस्था के विरुद्ध अस्पृश्यों के विद्रोह के इतिहास का संक्षिप्त विवरण। इसकी शुरुआत तो बंबई में हुई, पर यह भारत के सभी भागों में फैल गया है।