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अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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18 ऑक्टोबर 2023
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     तीसरा उदाहरण अभी हाल का है। वह हमला 1935 में बंबई के प्रेसिडेंसी के अहमदाबाद जिले के धोल्का तालुका में कवीथा नामक गांव में हुआ ।

     बंबई सरकार ने आदेश जारी किए किए सार्वजनिक स्कूलों में अस्पृश्यों के बच्चे दाखिल किए जाएं। उसके बारे में समाचार है¹ :


1. घटना का यह विवरण उस विवरण का अनुवाद है जो मेरे पास धोल्का के नवयुग मंडल के मंत्री ने भेजा है।


     आठ अगस्त, 1935 को कवीथा गांव के अस्पृश्य अपने चार बच्चों को स्कूल में दाखिला कराने के लिए गए। इसे देखने के लिए गांव के बहुत से सवर्ण हिंदू स्कूल के चारों तरफ जमा हो गए। दाखिले की कार्यवाही शांतिपूर्वक संपन्न हो गई और कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। लेकिन अगले दिन गांव के सर्वण हिंदुओं ने अपने-अपने बच्चों को उस स्कूल से हटा लिया, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे अस्पृश्यों के बच्चों के साथ पढ़ें और उन्हें छूत लग जाए ।

Revolt of Untouchables revolt of untouchables asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     उसके कुछ समय पश्चात् एक ब्राह्मण ने गांव के एक अस्पृश्य पर हमला किया। 12 अगस्त को गांव के अस्पृश्य लोग उस ब्राह्मण के खिलाफ मजिस्ट्रेट की कचहरी में फौजदारी की शिकायत लिखवाने के लिए धोल्का पहुंचे। जब गांव के हिंदुओं को पता चला कि अस्पृश्यों के बालिग लोग गांव में नहीं हैं, तो उन्होंने अस्पृश्यों के घरों पर हमला कर दिया। वे डंडों, भालों और तलवारों से लैस थे। हमलावरों में सवर्ण हिंदू महिलाएं भी शामिल थीं। उन्होंने अस्पृश्य बूढ़ों और औरतों को मारना पीटना शुरू कर दिया।

     इनमें से कुछ तो जंगलों में भाग गए, कुछ अपने घरों के भीतर दरवाजे बंद करके छिप गए। इन हमलावरों ने अपना गुस्सा उन अस्पृश्यों पर उतारा, जिनके बारे में शक था कि उन्होंने गांव के स्कूल में अपने बच्चों को भर्ती कराने के मामले में अगुवाई की थी। वे दरवाजे तोड़कर भीतर गुस गए और जब घरों के भीतर कोई नहीं मिला, तो उन्होंने घरों की छतों की खपरैल और धन्नियां तहस-नहस कर दीं।

     जिन अस्पृश्यों को मारा-पीआ गया, वे आतंकित थे। वे अपने उन बड़े-बूढ़ों की सुरक्षा के बारे में चिंतित थे, जो धोल्का गए हुए थे और उसी रात्रि को लौटने वाले थे। सवर्ण हिंदुओं को तो पता था कि अस्पृश्यों के जो नेता धोल्का गए हुए हैं, वे रात को किसी समय लौटेंगे। अतः वे हथियारों से पूरी तरह लैस होकर अस्पृश्यों पर हमला करने के लिए गांव से बाहर चले गए। वे गांव के रास्ते में झाड़ियों में छिपकर बैठ गए। जब एक अस्पृश्य वृद्धा को इसका पता चला तो वह रात के अंधेरे में छिपकर गांव के बाहर निकल गई। वह गांव वापस आ रहे नेताओं से मिली। उसने उन्हें बता दिया कि सवर्ण हिंदुओं की सशस्त्र टोलियां उनकी घात में छिपी बैठी हैं। अतः उन्हें गांव में नहीं आना चाहिए। उन्होंने यह सोचकर वृद्धा की बात को अनसुनी कर दिया कि उनकी गैर-हाजिरी में तो सवर्ण हिंदू और अधिक जुल्म ढा सकते हैं। साथ ही उन्हें डर था कि यदि वे गांव में गए तो उन पर हमला हो सकता है। अतः उन्होंने फैसला किया कि वे मध्य रात्रि के बाद तक गांव के बाहर खेतों में प्रतीक्षा करेंगे। इधर सवर्ण हिंदुओं की जो टोलियां घात में बैठी हुई थीं, वे प्रतीक्षा करती रहीं और अंत में वे चली गई। अस्पृश्यों के नेता गांव में प्रातः कोई तीन बजे के बाद घुसे। यदि वे इससे पूर्व आते और कातिल टोलियों के हत्थे चढ़ जाते, तो हो सकता था कि उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता। जान व माल की क्षति देखकर पौ फटने से पहले ही वे गांव छोड़कर अहमदाबाद के लिए रवाना हो गए और वहां उन्होंने हरिजन सेवक संघ के मंत्री को सूचना दे दी। यह संस्था वही है, जो गांधी ने अस्पृश्यों के कल्याण के लिए स्थापित की है। लेकिन मंत्री भी लाचार था। सवर्ण हिंदुओं ने न केवल मारपीट की, बल्कि उन्होंने ऐसी साजिश भी की कि अस्पृश्यों का जीना दूभर हो जाए। उन्होंने अस्पृश्यों को मजदूरी पर रखने और उन्हें खाने की चीजें बेचने से भी मना कर दिया। वे अस्पृश्यों के मवेशियों को चरने देने से रोकने लग गए हैं और जब-तब मौका पाकर अस्पृश्य औरतों और आदमियों को मारने-पीटने लगे हैं। यही नहीं, अपने उन्माद में सवर्ण हिंदुओं ने उस कुएं में मिट्टी का तेल डाल दिया, जिससे अस्पृश्य अपने पीने का पानी लिया करते हैं। ऐसा उन्होंने कई दिनों तक किया। इसका नतीजा यह हुआ कि गांव के अस्पृश्य पीने के पानी के लिए तरस गए। जब नौबत यहां तक पहुंच गई, तो अस्पृश्यों ने सोचा कि इस बारे में मजिस्ट्रेट के यहां फौजदारी का मामला दायर कर दिया जाए। उन्होंने यह मुकदमा 17 अक्तूबर को दायर कर दिया। यह मुकदमा सवर्ण हिंदुओं के खिलाफ दायर किया गया है।

     इस मामले में सबसे अजीब पक्ष श्री गांधी और उनके सहयोगी वल्लभभाई पटेल की भूमिका का है। श्री गांधी ने यह पूरी घटना जानते हुए कि कवीथा गांव के सवर्ण हिंदुओं ने अस्पृश्यों पर क्या-क्या अत्याचार और जुल्म किए थे, अस्पृश्यों को केवल यही सलाह देना ही काफी समझा कि अस्पृश्य गांव छोड़ दें। उन्होंने तो इतना भी सुझाव नहीं दिया कि उपद्रवियों को अदालत के कटघरे में खड़ा किया जाए। उनके सहयोगी वल्लभभाई पटेल की भूमिका तो और भी विचित्र रही। वह सवर्ण हिंदुओं को यह समझाने लग गए कि वे अस्पृश्यों पर जुल्म न करें। लेकिन सवर्णों ने उनकी एक न सुनी। फिर भी इन्हीं महाशय ने अस्पृश्यों की इस बात का विरोध किया कि हिंदुओं पर मुकदमा दायर किया जाए और अदालत से उन्हें सजा दिलाई जाए। उनके विरोध की परवाह न करते हुए अस्पृश्यों ने शिकायत दर्ज कराई। लेकिन अंततः श्री पटेल ने अस्पृश्यों को विवश किया कि वे सवर्ण हिंदुओं के खिलाफ अपनी शिकायत वापस ले लें। उन्होंने एक प्रकार के वायदे का नाटक रचा कि हिंदू छेड़छाड़ नहीं करेंगे। यह एक ऐसा वायदा था, जिसे अस्पृश्य कभी लागू नहीं करवा सकते। नतीजा यह हुआ कि अस्पृश्यों ने अत्याचार सहा और उन पर अत्याचार करने वाले लोग श्री गांधी के मित्र, श्री वल्लभभाई पटेल की मद से बचकर साफ निकल गए।

     सवर्ण हिंदू अस्पृश्यों पर यह क्रमबद्ध अत्याचार छोटे - मोटे मामलों में भी करते रहते हैं, जैसे उन्हें अच्छे कपड़े और जेवर नहीं पहनने दिए जाते।