अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
Ш
अंत में कौन जीतेगा, यह एक दिलचस्प अटकल है। जो लोग अस्पृश्यों के आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं, वे स्थिति को सावधानी से निरख-परख रहे हैं। अंततः नतीजा जो भी हो, पर एक बात स्पष्ट है कि इस संघर्ष में अस्पृश्यों का पलड़ा हल्का है।
हिंदुओं के साथ इस संघर्ष में सदैव अस्पृश्यों को ही दबाया जाता है। जब भी हिंदू अराजकता पर उतर आते हैं तो अस्पृश्य सदस ही असहाय हो जाते हैं। सवाल यह है कि सदैव उन्हें ही क्यों दबाया और मारा-पीटा जाता है? यह महत्वपूर्ण सवाल है, और इसका जवाब दिया जाना चाहिए ?
सवर्ण हिंदुओं के साथ इस संघर्ष में अस्पृश्य क्यों असहाय स्थिति में रहते हैं, इसके कारण नितांत स्पष्ट हैं। एक तो यह है कि जहां तक संख्या का संबंध है, दोनों समूह बराबर के जोड़ के नहीं हैं। किसी भी गांव में सवर्ण हिंदुओं की तुलना में अस्पृश्यों की संख्या अधिक नहीं है। अधिकांशतः उनके कुछ ही परिवार होते हैं, और उनकी संख्या इतनी नगण्य होती है कि वे सवर्ण हिंदुओं के किसी हमले का सामना नहीं कर सकते। भले ही अस्पृश्यों की संख्या पांच करोड़ है और वह काफी बड़ी संख्या दीख पड़ती है, पर वास्तव में वे भारत भर के गांवों में बिखरे हुए हैं। अतः हर गांव में वे अति अल्प संख्या में हैं और उनकी तुलना में सवर्ण हिंदुओं का भारी बहुमत है। सामरिक महत्व की दृष्टि से देखा जाए तो वे इतनी बुरी तरह बिखरे हुए हैं कि वे सवर्ण हिंदुओं पर हावी नहीं हो सकते, अपितु सवर्ण हिंदु ही उन पर हावी होंगे।
जहां तक संख्या का संबंध है, कुछ प्रांतों के गांवों में मुसलमानों की स्थिति भी अस्पृश्यों जैसी ही है। वे भी गांवों में बिखरे हुए हैं और कुछ गांवों में तो उनकी संख्या अस्पृश्यों की संख्या से भी कहीं कम है, फिर भी मुसलमानों को अस्पृश्यों की भाँति हिंदओं से असुविधाएं तथा अपमान नहीं झेलने पड़ते। यह कुछ विचित्र सी बात है, क्योंकि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भी उतना ही गहरा मनमुटाव है, जितना कि हिंदुओं और अस्पृश्यों के बीच व्यवहार से यह अंतर एक लाभ के कारण है। मुसलमानों को यह लाभ मिलता है, पर अस्पृश्यों को नहीं मिलता।
सभी प्राचीन समाजों का यह नियम था कि अजनबी पवित्र हैं। अनादर और आघात से उसके व्यक्तिगत की रक्षा की ही जानी चाहिए। रोमनों के आतिथ्य संबंधी अपने नियम थे और अजनबी के प्रति कर्तव्य रिश्तेदार के प्रति कर्तव्यों से भी कठोर थे। प्लेटो कहते हैं, 'जिसमें सावधानी का जरा सा भी कतरा बाकी है, वह इस बात का भरसक प्रयास करेगा कि वह जीवन भर अजनबी के प्रति पापाचरण नहीं करेगा।' यह विचित्र बात है कि किसी अजनबी के व्यक्तित्व को इतनी पवित्रता प्रदान की जाए। इसमें संदेह नहीं कि अजनबी के व्यक्तित्व को प्रति यह पवित्रता विशुद्ध दयाभाव से नहीं उपजी थी। सामूहिक जीवन का समूचा आचरण समूह सक बाहर के लोगों के प्रति सामान्य सहानुभूति का विरोध करता है। अजनबी को क्यों पवित्र और उसके व्यक्तित्व को क्यों अलंघनीय माना गया, इसका वास्तविक कारण यह था कि वह विरोधी समूह का होता था और यदि उसे कोई क्षति पहुंचाई जाती, तो निश्चित था कि रक्तपात होता ही रक्तपात के भय के कारण ही अजनबी के प्रति वह रुख अपनाया गया।
यही बात गांव के मुसलमानों पर लागू होती है। हिंदुओं की नजरों में वह अजनबी होता है। लेकिन हिंदू उसे छेड़ने की हिम्मत नहीं करते, क्योंकि वे जानते हैं कि यदि उसे कोई क्षति पहुंचाई गई तो प्रतिशोध में मुसलमान हिंदुओं का खून बहा देंगे। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगों में वास्तव में खून-खराबे होते हैं और वे तभी होते हैं, जब किसी मुसलमान अथवा किन्हीं मुस्लिम हितों को क्षति पहुंचाई जाती है। रक्तपात के इस भय के कारण ही हिंदुओं के गांव में मुसलमान का जीवन सुरक्षित बना रहता है।
यदि किसी अस्पृश्य को क्षति पहुंचाई जाए तो उसका प्रतिरोध लेने वाला है ही नहीं। रक्तपात को कोई भय है ही नहीं। अतः अस्पृश्यों के प्रति हिंदू कोई भी अन्याय कर सकते हैं और दंड से बच निकलते हैं। इसका कारण है कि मुसलमान एकजुट हैं। वे गहरी मानसिक चेतना से परस्पर आबद्ध हैं। यदि उनके संप्रदाय या किसी व्यक्ति के प्रति कोई अन्याय किया जाए, तो वे एक होकर उस अन्याय का प्रतिकार करने के लिए तैयार हो जाते हैं। दूसरी ओर, अस्पृश्य असंगठित हैं। वे जात-पांत के बंधन से जकड़े हुए हैं। सवर्ण हिंदू की भांति वे भी जात-पांत में विश्वास करते हैं। इस जात-पांत से अस्पृश्यों के बीच आपसी द्वेष और होड़ पैदा हो गई है। उसकी वजह से संयुक्त कार्रवाई असंभव हो गई है। मुसलमानों के बीच भी जात-पांत है। अस्पृश्यों की भांति वे भी समूचे देश में बिखरे हुए हैं। लेकिन उनका मजहब उनके बीच उन्हें जोड़ने वाला मजबूत धागा है। उनका मजहब उन्हें सिखाता है कि वे सब मुस्लिम संप्रदाय के भाग हैं। अस्पृश्यों के मानस में ऐसी भावना भरने वाला कोई भाव नहीं है। एकजुटता की भावना के अभाव में अस्पृश्य खंडों में बंटे हुए हैं। उन्हें जोड़ने वाली कोई चीज नहीं है। अतः उनकी संख्या उनके लिए बेकार है।
गांव के अस्पृश्य अधिकांशतः या तो गांव के सेवक हैं या भूमिहीन मजदूर हैं। गांव के सेवक के रूप में अपने भरण-पोषण के लिए हिंदुओं पर आश्रित हैं। वे घर-घर जाकर हर रोज हिंदुओं से रोटी या रांधा गया भोजन प्राप्त करते हैं। बदले में वे हिंदुओं की कुछ प्रथागत सेवाएं करते हैं। यह उनके पारिश्रमिक का एक अंश है। अंशतः वे अपने पारिश्रमिक के रूप में हिंदुओं के घरों से फसल की कटाई पर अनाज भी प्राप्त करते हैं। जब भी हिंदुओं और अस्पृश्यों के बीच कोई मतभेद होता है, तो पहला काम हिन्दू यह करते हैं कि वे अस्पृश्यों को रोटी और कटाई के हिस्से का उनका अनाज नहीं देते। वे अस्पृश्यों को किसी काम पर भी नहीं लगाते। नतीजा यह होता है कि संघर्षरत अस्पृश्यों को भुखमरी का सामना करना पड़ता है।
अस्पृश्यों के पास गांव में जीविका का कोई साधन नहीं रह जाता। वह दूध या सब्जी बेचने जैसा कोई धंधा नहीं कर सकता है। अस्पृश्य होने के कारण उससे कोई ये चीजें खरीदेगा ही नहीं। वह कोई व्यापार भी नहीं कर सकता है, क्योंकि सभी व्यापार पुश्तैनी होते हैं। अतः कोई भी उसकी सेवा स्वीकार नहीं करेगा। आर्थिक रूप से वह पूर्णत: हिंदू पर आश्रित है। जब भी स्पृश्य को यह लगता है कि अस्पृश्य अहंकारी या शरारती हो गया है, तो वह इस आर्थिक स्थिति का भरपूर लाभ उठाता है।
अस्पृश्य न केवल अपनी रोजी-रोटी के लिए स्पृश्य का मुंह जोहता है, बल्कि जीवन की दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिए भी उसकी यही नियति है। गांवों में सभी दुकानें स्पृश्यों की होती हैं। व्यापार स्पृश्य के हाथ में है और अनिवार्यतः होगा भी। अत: खरीदारी के लिए अस्पृश्य को स्पृश्य दुकानदार के आसरे रहना पड़ता है। अस्पृश्य दैनिक जरूरत की चीजें तभी प्राप्त कर सकेगा, जब स्पृश्य वे चीजें बेचना चाहेगा। यदि स्पृश्य बेचना नहीं चाहता, तो अस्पृश्य को भूखों मरना ही पड़ेगा, भले ही उसके पास पैसा हो । अतः जब भी स्पृश्य और अस्पृश्य के बीच कोई विवाद उत्पन्न हो जाता है, तो दुकानदारों को स्पृश्य यह आदेश देना नहीं भूलता कि अस्पृश्यों को कोई चीज न बेची जाए । स्पृश्य संगठित रूप से ऐसी साजिश करते हैं कि अस्पृश्यों से आर्थिक रिश्ता पूर्णतया टूट जाए। अस्पृश्यों के खिलाफ लड़ाई का एलान कर दिया जाता है। 'शत्रु' को तहस-नहस करने के के लिए दुष्टों का एक दंडात्मक अभियान दल अस्पृश्यों के क्षेत्र में भेज दिया जाता है। वह दल निर्भय होकर विध्वंस करता है। वह घरों को जला देता है, संपत्ति को नष्ट करता है। सभी के प्रति वह निर्लज्ज होकर हिंसा के कर्म करता है। वह औरतों और बच्चों को भी नहीं बख्शता ।
सर्वाधिक सामान्य और प्रभावी हथियार यह है कि अपराधी अस्पृश्यों के पूर्ण बहिष्कार की घोषणा कर दी जाती है। 'बहिष्कार' केवल गांधी के 'असहयोग' का ही दूसरा रूप है। उसकी विभीषिका का वर्णन नहीं किया जा सकता। पिछड़े वर्गों की शिकायतों की जांच के लिए बंबई सरकार ने जो कमेटी नियुक्त की थी, उसने सामाजिक बहिष्कार का वर्णन इस प्रकार किया है:
हालांकि हमने ऐसे विभिन्न उपायों की सिफारिश की है कि सभी सार्वजनिक उपयोगिताओं संबंधी अपने अधिकारों को अस्पृश्य प्राप्त कर सकें, फिर भी हमें डर है कि आने वाले लंबे अर्से तक अधिकार के प्रयोग के उनके मार्ग में अड़चनें आएंगी। पहली अड़चन तो यह आशंका है कि रूढ़िवादी वर्ग उनके खिलाफ खुली हिंसा करेंगे। इस बात की ओर ध्यान देना ही होगा कि हर गांव में अस्पृश्य अल्प संख्या में हैं। उनके विरोध में रूढ़िवादियों का भारी बहुमत है, जो अस्पृश्यों के किसी भी संभावित हमले से अपने हितों और प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए सब-व -कुछ करेगा। पुलिस की कार्यवाही के खतरे से रूढ़िवादी वर्गों के हिंसा के हौंसले पर अंकुश लग गया है। अतः ऐसे मामले विरल हो गए हैं।
दूसरी अड़चन अस्पृश्यों की वर्तमान आर्थिक स्थिति से पैदा होती है। प्रेसिडेंसी के अधिकांश भागों में अस्पृश्य आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हैं। कुछ लोग असामी के रूप में रूढ़िवादी वर्गों की भूमि जोतते हैं। ये असामी उनकी इच्छा के दास हैं। कुछ लोग रूढ़िवादी वर्गों के खेतों पर मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं। शेष रूढ़िवादी वर्गों के घरों से भोजन या अनाज प्राप्त करते हैं। बदले में वे गांव के सेवक के रूप में सेवा करते हैं। हमने ऐसे अनेक उदाहरण सुने हैं, जहां जब भी गांव के दलित वर्गों ने अपने अधिकारों के प्रयोग का साहस जुटाया तो वहां के रूढ़िवादी वर्गों ने हथियार के रूप में अपनी इस आर्थिक शक्ति को आजमाया है और उन्हें अपनी भूमि से बेदखल कर दिया है। उन्हें रोजगार से हटा दिया गया है और गांव के सेवक के रूप में उनका पारिश्रमिक बंद कर दिया गया है। प्रायः बहिष्कार की योजना बड़े पैमाने पर बनाई जाती है। उसके अंतर्गत अस्पृश्य आम रास्तों पर नहीं चल सकते। वे ग्राम के बनिए या दुकानदार से दैनिक जरूरत की चीजें नहीं खरीद सकते। साक्ष्य के अनुसार बहुधा छुटपुट कारणों के आधार पर ही अस्पृश्यों के खिलाफ सामाजिक बहिष्कार की घोषणा कर दी जाती है, जैसे यदि कोई अस्पृश्य सांझे कुएं से पानी भरने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करे। लेकिन ऐसे मामले भी कम नहीं हैं, जहां कठोर से कठोर बहिष्कार की घोषणा कर दी गई। कारण बस इतना सा था कि किसी अस्पृश्य ने जनेऊ धारण कर लिया, भूमि का टुकड़ा खरीद लिया अच्छे कपड़े या जेवर, पहन लिए या सार्वजनिक मार्ग पर दूल्हे को घोड़ी पर बिठाकर शादी का जुलूस निकाल दिया ।
हम नहीं कह सकते हैं कि अस्पृश्यों के दमन के लिए इस सामाजिक बहिष्कार से भी अधिक प्रभावी कोई और हथियार खोजा जा सकता है। खुली हिंसा का उपाय भी इसके सामने फीका पड़ जाता है, क्योंकि इसके अति दूरगामी और घातक प्रभाव पड़ते हैं। यह अधिक खतरनाक है, क्योंकि सहमति पर आधारित आजादी के सिद्धांत संगत वैध उपाय के रूप में यह चलता रहता है। हम सहमत हैं कि बहुसंख्यकों के इस अत्याचार को सख्ती से कुचला जाए, यदि हम अस्पृश्यों को उनके उद्धार के लिए वाणी और कर्म की आवश्यक आजादी की गारंटी देना चाहते हैं।