अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
उनकी कामनाएं हमारे लिए कानून हैं
1. धर्म के स्थान पर अधर्म,
II. मनु और कर्म,
III. आधुनिक प्रतिरूप, तथा
IV. चरित्र और दृष्टिकोण पर धर्म का प्रभाव।
जो भी अस्पृश्यों के आंदोलन को कुचलने के लिए हिंदुओं की अराजकरत के बारे में पढ़ता है, मुझे विश्वास है कि उसे गहरा धक्का लेगा । निश्चय ही वह यह सवाल पूछेगा कि किस कारण हिंदू इस अराजकता में लिप्त होता है। कोई भी यह नहीं कहेगा कि ऐसा प्रश्न स्वाभाविक प्रश्न नहीं होगा, और मामले की परिस्थतियों को देखते हुए अति संगत प्रश्न यह होगा कि अस्पृश्य यदि साफ वस्त्र पहनता है तो उस पर अत्याचार क्यों किया जाए? हिंदू को उससे क्या आघात पहुंच सकता है ? अस्पृश्य के साथ क्यों छेड़-छाड़ की जाए? यदि वह अपने घर पर खपरैल की छत डालता है? हिंदू का उससे क्या बिगड़ता है ? अस्पृश्य को क्यों पीड़ा पहुंचाई जाए, यदि वह अपने बच्चों को स्कूल भेजना चाहता है? उससे हिंदू की क्या हानि होती है ? अस्पृश्य को क्यों विवश किया जाए कि वह मृत पशुओं को उठाए, सड़ा-गला मांस खाए और घर-घर जाकर अपने भोजन के लिए गिड़गिड़ाए ? हिंदुओं को क्या घाटा होता है, यदि वह इन कामों को न करे ? हिंदू को क्यों आपत्ति करनी चाहिए, यदि अस्पृश्य अपना धर्म बदलना चाहता है? उसके धर्म-परिवर्तन से हिंदू क्यों नाराज हों और बौखलाएं? हिंदू स्वयं को क्यों अपमानित अनुभव करें, यदि अस्पृश्य अपना सुंदर एवं सम्माननीय नामकरण करता है? किसी अस्पृश्य का उत्तम नाम हिंदू पर प्रतिकूल प्रभाव कैसे डाल सकता है? हिंदू को क्यों आपत्ति करनी चाहिए, यदि कोई अस्पृश्य अपने घर का द्वार मुख्य सड़क की ओर खोलता है? उससे उसका क्या बनता-बिगड़ता है? हिंदू को क्यों आपत्ति करनी चाहिए, यदि किन्हीं निश्चित दिवसों पर उसके कानों तक किसी अस्पृश्य की आवाज पहुंचती है? उससे वह बहरा तो नहीं हो सकता। हिंदू को क्यों अप्रसन्नता व्यक्त करनी चाहिए, यदि कोई अस्पृश्य कोई काम करता है, प्राधिकार वाला कोई पद प्राप्त कर लेता है, भूमि खरीद लेता है, व्यापार करता है, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाता है और उसकी गिनती खाते-पीते लोगों में होने लगती है? सभी हिंदू, चाहे सरकारी हों या गैर-सरकारी, मिलकर अस्पृश्यों का दमन क्यों करते हैं? सभी जातियां, चाहे वे आपस में लड़ती-झगड़ती रहें, हिंदू धर्म की आड़ में एकजुट होकर क्यों साजिश करती हैं, और अस्पृश्यों को असहाय स्थिति में रखती हैं।
निश्चय की यह सब परी लोक की कथा-सी लगती है। लेकिन जिसने पिछले अध्याय में वर्णित हिंदुओं के अत्याचार की कथाओं को पढ़ा है, उसे मालू होगा कि यह निंदनीय प्रश्न तथ्यों पर आधारित हैं। निश्चय ही तथ्य काल्पनिक कथ्य से अद्भुत होता है। लेकिन सबसे मजेदार बात यह है कि ये सब कारनामें वे हिंदू करते हैं, जो सामान्यतः भीरु होते हैं, यहां तक कि उन्हें कायर भी कहा जाता है। सामान्यतः हिंदू अति विनम्र लोग होते हैं। उनमें मुस्लिमों जैसी उग्रता अथवा कटुता नहीं होती। लेकिन जब हिंदू जैसे अति विनम्र लोग बेशर्मी और निर्ममता से आगजनी, लूटमार और हिंसा का सहारा लेकर पुरुषों, महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार करने लगते हैं, तो यह विश्वास करना पड़ता है कि निश्चय ही कोई ऐसा बाध्यकारी कारण होगा, जो अस्पृश्यों के इस विद्रोह को देखने पर हिंदुओं को पागल बना देता है और वे ऐसी अराजकता पर उतारू हो जाते हैं।
निश्चय ही ऐसे विचित्र और अमानवीय व्यवहार का कोई स्पष्टीकरण तो होना चाहिए। वह क्या है?
यदि आप किसी हिंदू से पूछेंगे कि वह ऐसा बर्बर व्यवहार क्यों करता है, क्यों वह घोर अपमान अनुभव करता है जब अस्पृश्य स्वच्छ और सम्मानजनक जीवन जीने का प्रयास करते हैं, तो उसका उत्तर सीधा-सा होगा । वह कहेगा, 'अस्पृश्यों के जिस प्रयास को आप सुधार कहते हैं, वह सुधार नहीं है। वह हमारे धर्म का घोर अपमान है।' यदि आप उससे फिर पूछेंगे कि इस धर्म की व्यवस्था कहां है तो पुनः उसका उत्तर एकदम सीधा-सा होगा, 'हमारा धर्म हमारे शास्त्रों में है।' हिंदू, पूर्वाग्रह-रहित व्यक्ति की दृष्टि से, अस्पृश्यों के उस न्यायोचित विद्रोह का दमन कर रहा है, जो वे हिंसा, लूटमार, आगजनी पर आधारित मूलतः अन्यायपूर्ण प्रणाली के विरुद्ध कर रहे हैं। आधुनिक व्यक्ति को लगता है कि दमन का सहारा लेकर हिंदू नितांत धर्म-विरोधी कार्य कर रहा है या हिंदुओं की प्रचलित शब्दावली में कहा जाए जो वह 'अधर्म' का रहा है। लेकिन हिंदू इसे कदापि स्वीकार नहीं करेगा। हिंदू का विचार है कि 'धर्म' का उल्लंघन तो अस्पृश्य कर रहे हैं और अराजकता के उसके कर्म तो अधर्म से लगते हैं। उनकी प्रेरणा उसे धर्म के पुनरुद्धार हेतु उसके पावन कर्तव्य से मिलती है। यह एक ऐसा उत्तर है जिसकी सत्यता को वे लोग नहीं नकार सकते, जो हिंदुओं की मानसिकता से परिचित हैं। लेकिन इससे एक और प्रश्न उत्पन्न होता है कि वे धर्म क्या है, जिनकी व्यवस्था शास्त्रों ने की है और उनमें सामाजिक संबंधों के बारे में क्या नियम निर्धारित किए गए हैं।