अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
क्योंकि कात्यायन के अनुसार केवल वे ही जो वेदाध्ययन करने के अधिकारी थे, यज्ञ करने के भी अधिकारी थे। यह तथ्य कि कभी शूद्र वेदाध्ययन के अधिकारी थे, एक ऐसा तथ्य है, जिसका सम्यक समर्थन 'महाभारत' के 'शांति पर्व' में उल्लिखित परंपरा करती है। वहां भृगु ऋषि ने इस प्रश्न का उत्तर दिया है कि वर्ण का निर्धारण कैसे किया जाए? उत्तर इस प्रकार है :
पहले वर्णों में कोई अंतर नहीं था। ब्रह्मा से उत्पन्न होने के कारण यह सारा जगत ब्राह्मण ही था। बाद में विभिन्न कर्मों के कारण उनमें वर्ग-भेद हो गया। जो ब्राह्मण (द्विज) अपने ब्राह्मणोचित धर्म को परित्याग करके विषय भोग के प्रेमी, तीक्ष्ण स्वभाव वाले हो गए और इन्हीं कारणों से जिनका शरीर लाल हो गया, वे क्षत्रिय भाव को प्राप्त हुए। जिन्होंने गौओं से तथा कृषिकर्म द्वारा जीविका चलाने की वृत्ति अपना ली और उसी के कारण जिनका रंग पीला पड़ गया तथा जो ब्राह्मणोचित धर्म को छोड़ बैठे, वे ब्राह्मण ही वैश्य भाव को प्राप्त हुए। जो शौच तथा सदाचार से भ्रष्ट होकर हिंसा और असत्य के प्रेमी हो गए, लोभवश व्याधों के समान सभी तरह के निन्ध्र-कर्म करके जीविका चलाने लगे और उसी के कारण जिनका रंग काला पड़ गया, वे ब्राह्मण शूद्र भाव को प्राप्त हो गए। इन्हीं कर्मों के कारण ब्राह्मण शूद्र भाव को प्राप्त हो गए। इन्हीं कर्मों के कारण ब्राह्मणत्व से अलग होकर वे सभी ब्राह्मण दूसरे दूसरे वर्ण के हो गए, किंतु उनके लिए नित्य धर्मानुष्ठान और यज्ञ कर्म का कभी निषध नहीं किया गया है। इस प्रकार ये चार वर्ण हुए, जिनके लिए ब्रह्मा ने पहले ब्राह्मी सरस्वती ( वेदवाणी ) प्रकट की। लेकिन लोभ-विशेष के कारण शूद्र अज्ञान भाव को प्राप्त हुए।
'ब्राह्मी सरस्वती' शब्द की व्याख्या करते हुए व्याख्याकार ने कहा है :
वेद-रहित सरस्वती की रचना पहले ब्रह्मा ने सभी चारों वर्णों के लिए की, लेकिन लोभ-विशेष के कारण शूद्र अज्ञान ( तमस भाव) को प्राप्त हुए और वेदाध्ययन के अनधिकारी हो गए।
शूद्रों का दर्जा घटाने के बाद वैश्यों की बारी आई। सर्वाधिक कटु वर्ग- युद्ध ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच हुआ। हिंदू शास्त्रों में इन दो वर्णों के बीच वर्ग-युद्ध का प्रचुर उल्लेख है। सर्वप्रथम संघर्ष ब्राह्मणों और राजा वेन के बीच हुआ।
पहले कभी अंग नामक प्रजापति हुआ करता था। वह सत्य का संरक्षक था । वह अत्रि जाति का था और शक्ति में अत्रि जैसा ही था। प्रजापति वेन उसका पुत्र था। वेन को जैसे-तैसे कर्तव्य की शिक्षा दी गई। मृत्यु की पुत्री सुनीता के गर्भ से उसका जन्म हुआ। काल की पुत्री के इस पुत्र ने अपने नाना से कुसंस्कार ग्रहण किया। अतः वह अपने कर्तव्य से विमुख हो गया और काम के वशीभूत होकर लोभी बन गया। इस राजा ने अधार्मिक आधार प्रणाली की स्थापना की। वेदाज्ञाओं का उल्लंघन कर धर्म-विरुद्ध आचार व्यवस्था की स्थापना की और वह क्रूर कर्म करने लग गया। उसके शासन काल में लोग पवित्र ग्रंथों के अध्ययन और वषट्कार ( यज्ञ - कर्म) से विमुख हो गए। देवता यज्ञों में सोम रस के नैवेद्य से वंचित हो गए। उसने घोषणा कर दी, 'यज्ञ मेरे लिए है, मैं ही यज्ञकर्ता हूं, मैं ही यज्ञ हूं। अतः हवि मुझे ही दी जाए और नैवेद्य भी मुझे ही अर्पित किया जाए।' कर्तव्य संबंधी नियमों का उल्लंघन करने वाले तथा दाय भाग पर झूठा अधिकार जताने वाले उस राजा से तब मारीचि के नेतृत्व में सभी महर्षियों ने कहा, 'हे राजन हम एक यज्ञ करना चाहते हैं। यह अनुष्ठान अनेक वर्षों तक चलेगा। अतः असत्य का आचरण न करो। यह तुम्हारा सनातन कर्तव्य नहीं है। तुम अत्रि के वंशज हो और तुम्हारा कर्तव्य अपनी प्रजा का पालन करना है।' मूर्ख वेन को सद्-असद् का कोई ज्ञान नहीं था। उसने ऋषियों का उपहास करते हुए उनको उत्तर दिया, 'मेरे सिवाए और कौन है, जो कर्तव्य का विधान करता है? मुझे किसकी आज्ञा का पालन करना चाहिए? है कोई इस भूतल पर जो पवित्र ज्ञान, धर्मपरायणता, सत्य में मेरी बराबरी कर सके ? अरे, तुम तो भ्रमित तथा मतिहीन हो, तुम क्या जानों कि मैं ही सभी प्राणियों तथा कर्तव्यों का आदि स्रोत हूं। तुम समझ लो कि यदि मैं चाहूं तो पृथ्वी को भस्म कर दूं अथवा उसे जलमग्न कर दूं अथवा स्वर्ग और धरती को एक कर दूं।' जब मतिभ्रष्ट तथा अहंकारी वेन को सुमार्ग पर नहीं लाया जा सका तो ऋषिगण क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने उस उत्पाती तथा कलह प्रिय राजा को दबोच लिया और उसकी बाई जंघा का मर्दन किया। जंघा के इस मर्दन से काले वर्ण का एक व्यक्ति उत्पन्न हुआ। वह नाटे कद का था । भय के मारे वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। अत्रि ने उसे भयातुर देखकर उससे कहा, 'निषिद' बैठ जाओ। वह व्यक्ति निषादों की जाति का संस्थापक बना। वह धीवरों (मछुआरों ) का जनक भी बना, जो वेन के पाप से पैदा हुए। विंध्य श्रेणी के तुखार और तुम्बुरा नामक अन्य निवासी भी उसी से पैदा हुए, जो क्रूर कर्म करते थे। फिर उन क्रुद ऋषियों ने वेन के दाएं हाथ का मर्दन उसी प्रकार किया, जैसे अरणि किया जाता है। उससे पृथु पैदा हुआ । उसका शरीर साक्षात अग्नि जैसा जल रहा था।
वेन के पुत्र पृथु ने तब हाथ जोड़कर महान ऋषियों से कहा : 'कर्तव्य के सिद्धांतों को समझने के लिए प्रकृति ने मुझे अति अल्प बुद्धि प्रदान की है। कृपया बताएं, किस प्रकार मैं उसका उपयोग करूं। आप मुझे जो बताएंगे, निस्संदेह मैं वही करूंगा।' फिर उन देवताओं तथा महर्षियों ने उससे कहा, 'जो कर्तव्य बताया जाए, उसका बिना किसी संकोच के पालन करो, भले ही वह तुम्हें रुचिकर न हो, सभी प्राणिकयों के प्रति समदृष्टि रखों, काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार से दूर रहो। अपने भुजबल से उन सभी लोगों पर अंकुश रखो, जो सच्चाई के रास्ते से विमुख हो जाते हैं और कर्तव्य के प्रति सजग रहते हुए मन, वचन और कर्म से पृथ्वी के देवताओं (वेद अथवा ब्राह्मण) की रक्षा का व्रत लो और उस व्रत का सतत् पालन करते रहो।... और वचन दो कि तुम ब्राह्मणों को दंड से मुक्त रखोगे, और समाज को वर्ण संकरता से बचाओगे।' इस पर ऋषियों के नेतृत्व वाले देवताओं को जिनका नेतृत्व ऋषि कर रहे थे, वेन के पुत्र ने उत्तद दिया : ने ‘निश्चय ही मैं महान ब्राह्मणों का, जो मनुष्यों में उत्तम हैं, आदर करूंगा।' उन ऋषियों ने कहा, ‘तथास्तु'। दिव्य के ज्ञान के भंडार शुक्र उसके पुरोहित बने, बालखिल्य ऋषिगण तथा सारस्वेत्य ऋषिगण उसके मंत्री बने और पूजनीय गर्ग नामक महर्षि उसके ज्योतिषि बने ।