अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
दूसरा संघर्ष ब्राह्मणों तथा क्षत्रिय राजा पुरुरवा के बीच हुआ। 'महाभारत' के 'आदि पर्व' में उसका संक्षिप्त उल्लेख मिलता है।
... उसके बाद इला के गर्म से विद्वान पुरुरवा का जन्म हुआ । सुना जाता है कि इला पुरुरवा की माता भी थी और पिता भी । राजा पुरुरवा समुद्र के तेरह द्वीपों का शासन और उपभोग करते थे। महायशस्वी पुरुरवा मनुष्य होकर भी देवताओं से घिरे रहते थे। उन्होंने अपने पराक्रम से उन्मत्त हो ब्राह्मणों के साथ युद्ध किया, और ब्राह्मणों से उनके रत्नों को छीन लिया, जिसका उन्होंने तीव्र प्रतिकार भी किया था। ब्रह्म लोक से सतत्कुमार ने ब्रह्म लोक आकर उनकी भर्त्सना की, जिसका उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तब क्रुद्ध महर्षियों के शाप से वह भस्म हो गए। वह बल के घमंड में अपनी विवेक शक्ति खो बैठे थे। इस तेजस्वी राजा ने गंधर्व लोक से लाकर पृथ्वी पर यज्ञ के लिए अग्नियों की स्थापना की।
कहा जाता है कि तीसरा संघर्ष ब्राह्मणों और राजा नहुष के बीच हुआ। 'महाभारत' के 'उद्योग पर्व' में उस कथा का विस्तार से वर्णन किया गया है। उसमें कहा गया है :
वृत्रासुर की हत्या करने के बाद इंद्र इस बात से भयभीत होकर कि उन्होंने ब्रह्म-हत्या की है (क्योंकि वृत्र को ब्राह्मण माना जाता था), जल में छिप गए। जब देवराज इंद्र अदृश्य हो गए तो भूतल तथा स्वर्ग का सभी कारोबार अस्त-व्यस्त हो गया। ऋषियों तथा देवताओं ते तब नहुष से राजा बन जाने की प्रार्थना की। पहले तो नहुष ने बहाना बनाया कि उनमें बल का अभाव है, पर अंततः उन्होंने ऋषियों का आग्रह स्वीकार कर लिया। जब तक वह उच्च पद पर आसीन नहीं हुए थे, वह धर्माचरण करते रहे। लेकिन अब वह आमोद-प्रमोद और विषय-भोगों में लिप्त थे। यहां तक कि जब एक दिन उनकी दृष्टि इंद्राणी, अर्थात् इंद्र की पत्नी, पर पड़ी, तब वह उसे पाने के लिए लालायित हो उठे। इंद्राणी ने देवताओं के गुरु अंगिरस वृहस्पति की शरणी ली। वृहस्पति ने इंद्राणी को उसकी रक्षा का वचन दिया। इस हस्तक्षेप को सुनकर नहुष क्रुद्ध हो गए, लेकिन देवताओं ने उन्हें शांत करने का प्रयास किया और कहा कि पराई स्त्री को अपनी पत्नी बनाना पाप-कर्म है। लेकिन नहुष ने उनकी एक न सुनी और अपनी बात पर यह कहकर अड़े रहे कि वह इंद्र से किसी तरह कम नहीं है। उन्होंने कहा : 'इंद्र ने पूर्व काल मे यशस्वी ऋषि पत्नी अहल्या का उसके पति के जीते-जी सतीत्व नष्ट किया था, तब आपने उसे क्यों नहीं रोका था? जब प्राचीन काल में इंद्र ने अनेक पाप कर्म और छल-कपट किए थे, तब उसे क्यों नहीं रोका गया था।' नहुष ने देवताओं से इंद्राणी को लाने के लिए कहा, लेकिन वृहस्पति ने उसे भेजने से इंकार कर दिया। लेकिन उनके सुझाव पर इंद्राणी ने नहुष से कुछ समय मांग लिया, ताकि इस बीच वह अपने पति की खोज-खबर ले-ले । अनुरोध स्वीकार कर लिया गाय। उसके बाद इंद्र की ओर से देवताओं ने विष्णु से प्रार्थना की। विष्णु ने वचन दिया, 'यदि इंद्र मेरे लिए यज्ञ करे तो मैं इंद्र को पाप - मुक्त कर दूंगा और उसे पुनः उसका पद दिला दूंगा, और नहुष नष्ट हो जाएगा।' इंद्र ने तद्नुसार यज्ञ किया और उसका फल इस प्रकार बताया गया है; 'वसव (इंद्र) ने ब्रह्म-हत्या के पाप को वृक्षों, नदियों, पर्वतों, पृथ्वी और स्त्री समुदाय में बांट दिया और तब वह कष्टों और पाप से मुक्त होकर स्वाधीन हो गया' इस प्रकार नहुष को इंद्र के पद से हटा दिया गया।
लेकिन (यहां वर्णन में कोई गड़बड़ी है) उसने निश्चित रूप से शीघ्र ही अपना स्थान प्राप्त कर लिया होगा, क्योंकि कहा जाता है कि इंद्र पुनः नष्ट हो गए और अदृश्य हो गए।
तब इंद्राणी अपने पति की खोज में निकलीं और रात्रि देवी तथा रहस्यों (रात्रि की देवी और रहस्यों को उद्घाटित करने वाली ) की सहायता से उसने इंद्र को खोज निकाला। वह हिमालय के उत्तर में सागर के भीतर स्थित महाद्वीप की एक झील में कमल की नाल में अत्यंत सूक्ष्म रूप से अवस्थित थे। इंद्राणी ने उन्हें नहुष के पापपूर्ण मतव्य की सूचना दी और उनसे कहा, 'अब आप अपनी शक्ति का उपयोग कीजिए, संकट से मेरी रक्षा कीजिए और देवताओं के राज्य का शासन पुनः अपने हाथ में लीजिए।' पर इंद्र ने तुरंत कोई हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया और कहा कि नहुष बहुत बलवान हो गया है। उसने अपनी
पत्नी को एक युक्ति सुझाई, जिसके द्वारा अनाधिकार चेष्टा करने वाले नहुष को उसके पद से हटाया जा सकता है। उसे यह अधिकार बताया गया कि वह नहुष से यह कहे कि 'अगर तुम ऋषियों द्वारा ढोए गए दिव्य वाहन ( पालिका) में बैठकर मेरे पास आओ, तब मैं सहर्ष तुम्हें स्वीकार कर लूंगी।' नहुष ने इंद्राणी के आने पर उसका सत्कार किया और इंद्राणी ने देवताओं की समस्या नहुष को सुनाई और यह प्रस्ताव रखा, 'हे देवराज, मेरी इच्छा है कि आपके पास एक ऐसा अपूर्व वाहन (पालकी) हो, जैसा कि विष्णु, रुद्र, असुर और राक्षरों के पास भी न हो । प्रभो, महर्षि मिलकर इस वाहन में आपको लाएं। राजन् इससे मुझे प्रसन्नता होगी।' इंद्राणी ने ऐसा कहने पर देवराज नहुष को बात जंच गई और देवराज नहुष आत्म-प्रशंसा से भरकर बोले, 'जो ऋषियों को अपना वाहन बना सकता है, वही शक्तिशाली होता है। मैं परम शक्ति का अनन्य उपासक हूं। भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों का अधिपति हूं। मेरे कुपित होने पर यह संसार मिट जाएगा। मुझ पर ही सब कुछ टिका है।... अतः देवि, निश्चय ही मैं तुम्हारी इच्छा का पालन करूंगा। सारे सप्तर्षि और ब्रह्मर्षि मेरी पालकी ढोएंगे। हे सुंदरी, मेरे शौर्य और समृद्धि को तुम स्वयं देखना । ' तद्नुसार उस दुराचारी, उग्र, मदांध, स्वेच्छाचारी नहुष ने ऋषियों को, जो उसके आदेश की अवज्ञा नहीं कर सके, अपनी पालकी में जोत दिया और उन्हें पालकी ले चलने के लिए कहा। इंद्राणी पुनः वृहस्पति के पास गई। वृहस्पति ने उसे पुनः आश्वासन दिया कि नहुष अपने गर्व के कारण शीघ्र ही भ्रष्ट हो जाएगा और वह उस अत्याचारी के नाश तथा इंद्र के छिपने के स्थान का पता लगाने के लिए यज्ञ करेंगे। इसके बाद इंद्र का पता लगाने और उन्हें वृहस्पति के पास लाने के लिए अग्नि को भेजा जाता है। इंद्र के आने पर वृहस्पति उन्हें उनकी अनुपस्थिति में हुए कांड के बारे में बताते हैं। इंद्र जब कुबेर, यम, सोम और वरुण के साथ बैठकर नहुष के वध का उपाय सोच रहे थे, उसी समय वहां तपस्वी अगस्तय दिखाई देते हैं। उन्होंने इंद्र को उनके प्रतिद्वंदी के पतन पर बधाई दी और सारा वृतांत बताया। उन्होंने कहा कि : महाभाग देवर्षि तथा निर्मल अंत:करण वाले ब्राह्मर्षि पापाचारी नहुष को ढोते ढोते जब थक गए, तब उन्होंने नहुष से एक शंका प्रकट की, 'विजयी, वीरों में श्रेष्ठ, हे वसव, बलि देने से पूर्व उसे अभिषिक्त करने के लिए जिन मंत्रों के उच्चारण का विधान वेद में निहित है, क्या आप उन्हें प्रामाणिक मानते हैं?' नहुष की बुद्धि अज्ञान के अंधकार से ग्रसित थी। उसने कहा, 'मैं इन वेद मंत्रों को प्रामाणिक नहीं मानता।' ऋषियों ने कहा, 'आप अधर्म में प्रवृत्त हो रहे हैं। इसलिए धर्म का तत्व नहीं समझ रहे हैं। ये मंत्र पूर्व काल में महर्षियों ने हमें सुनाए थे और हम इन्हें प्रामाणिक मानते हैं।' अगस्त्य ने आगे कहा - तब नहुष मुनियों से विवाद करने लगा और क्रोध में भरकार उस पापी ने मेरे मस्तक पर अपने पैर से प्रहार किया। इससे उसका सारा तेज नष्ट हो गया और वह श्रीहीन हो गया। वह क्षुब्ध और भयभीत हो उठा। मैंने उससे कहा, 'मूर्ख तू उन पवित्र मंत्रों की निंदा करता है, जो सर्वदा से पूजनीय रहे हैं। जिनकी रचना प्राचीन ऋषियों ने की है, जिनको ब्रह्मर्षि उपयोग में लाते थे, तूने मेरे सिर पर अपने पैर से प्रहार किया है, तू ब्रह्मा के समान और अजेय ऋषियों से अपनी पालकी उठवाता है, इसीलिए तू श्रीहीन हो गया है, तेरे सारे पुण्य नष्ट हो गए हैं, तेरा पतन हो, तू स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरकर विशाल सर्प बनकर दस हजार वर्षों तक रेंगेगा। इस अवधि के पूरा होने पर पुनः स्वर्ग लोक को प्राप्त होगा।' इस प्रकार दुरात्मा नहुष स्वर्ग से निष्कासित हुआ ।