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अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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18 ऑक्टोबर 2023
Book
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     उसके बाद राजा निमि और ब्राह्मणों के बीच संघर्ष का उल्लेख मिलता है। 'विष्णु पुराण' में यह वृतांत इस प्रकार वर्णित है :

     निमि ने ब्रह्मषि वशिष्ठ से प्रार्थना की कि वह यज्ञ में पुरोहित बनें। यज्ञ एक हजार वर्ष चलने वाला था। उत्तर में वशिष्ठ ने कहा कि वह पहले ही पांच सौ वर्ष के लिए इंद्र को वचन दे चुके हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि इस अवधि के समाप्त होने पर वह लौट आएंगे। राजा ने कुछ नहीं कहा। वशिष्ठ यह धारणा लेकर वहां से चले गए कि राजा इस व्यवस्था से सहमत हो गए हैं। लेकिन वापस लौटने पर उनको पता चला कि निमि ने ( वशिष्ठ के स्तर के ) ब्रह्मर्षि गौतम तथा अन्य ऋषियों को यज्ञ करने के लिए आमंत्रित कर रखा है। चूंकि उन्हें उसकी कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई, इसलिए उन्होंने इस अपनी अवहेलना समझा और तब कुपित होककर उन्होंने राजा को, जो उस समय सोया हुआ था, श्राप दिया कि उसका स्थूल शरीर नष्ट हो जाए। जब राजा सोकर उठे और पता चला कि उन्हें बिना किसी पूर्व चेतावनी के श्राप दे दिया गया तो उन्होंने भी प्रतिरोध में वशिष्ठ को वैसा ही श्राप दे डाला और अपनी शरीर छोड़ दिया। इस श्राप के फलस्वरूप (‘विष्णु पुराण' 4, 5, 6 में आगे कहा गया है ) वशिष्ठ का तेज मित्र और वरुण के तेज में प्रविष्ठ कर गया और उसने उनके वीर्य से दूसरा शरीर प्राप्त कर लिया, जो उर्वशी को देखकर स्खलित हुआ था। निमि के शव को संलेपन द्वारा सुरक्षित रखा गया। जो यज्ञ निमि ने प्रारंभ किया था, उसके समापन पर पुरोहितों के अनुनय-विनय करने पर देवता निमि को पुनर्जीवित करने के लिए राजी हो गए। लेकिन निमि ने यह प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया और उनकी इच्छा के अनुसार देवताओं ने उन्हें सभी चेतन प्राणियों की आंखों में स्थान दे दिया। इसी तथ्य का यह प्रभाव है कि प्राणी सदा आंखे खोलते और बंद करते रहते हैं (निमिष का अर्थ है, 'पलक की झपक') ।

Brahmins vs Kshatriyas touchables vs untouchables asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by Dr Babasaheb Ambedkar

     मनु ब्राह्मणों तथा राजा सुमुख के बीच हुए एक और संघर्ष का उल्लेख करता है । पर उसके बारे में कोई ब्यौरा प्राप्त नहीं है।

     ये ब्राह्मणों तथ क्षत्रिय राजाओं के बीच हुए संघर्षों के उदाहरण हैं। इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि दो वर्गों के रूप में ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच झड़पें नहीं हुई। इसी तथ्य के प्रचुर प्रमाण मिलते हैं कि राजाओं से हुई झड़पों के अलावा इन दो वर्गों के बीच भी झड़पें हुई। ये प्रमाण ऐतिहासिक महत्व की सामग्री हैं, जिस पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। इस प्रकार की तीन घटनाएं उल्लेखनीय हैं।

     पहला विवाद तो क्षत्रिय विश्वामित्र और ब्राह्मण वशिष्ठ के बीच ठना । दोनों के बीच विवाद का मुद्दा था कि क्या कोई क्षत्रिय ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर सकता है। इसका वर्णन 'रामायण' में इस प्रकार मिलता है :

     कहा जाता कि कि प्राचीन काल में कुश नामक एक प्रसिद्ध राजा हुए हैं। वह प्रजापति के पुत्र थे। कुश के पुत्र का नाम कुशानभ था। कुशानभ के पुत्र गाधि नाम से विख्यात थे। उन्हीं गाधि के पुत्र विश्वामित्र हुए। विश्वामित्र ने कई हजार वर्षों तक पृथ्वी पर शासन किया। एक समय की बात है कि जब वह पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे थे तो वह महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पर आ पहुंचे, जहां अनेक संत, महात्मा, ऋषि और भक्तगण निवास किया करते थे। वहां पहले तो उन्होंने आतिथ्य स्वीकार नहीं किया, पर बाद में अपनी सेना सहित ब्रह्मा के पुत्र (वशिष्ठ) का आतिथ्य स्वीकार कर लिया। वहां विश्वामित्र एक अद्भुत गौ को देखकर ललचा उठे, जिसने अत्यंत स्वादिष्ठ भोजन प्रदान किया था। सर्वप्रथम उन्होंने उस गौ को उन्हें एक सहस्त्र गौओं के बदले देने के लिए कहा। उन्होंने यह भी कहा 'यह गौ तो रत्न है और चूंकि रत्न राजा की संपत्ति होते हैं, अतः इस गौ पर मेरा अधिकार है।' जब वशिष्ठ ने इस मूल्य को स्वीकार नहीं किया तो विश्वामित्र ने और अधिक मूल्य देने का प्रस्ताव किया, पर उसको कोई फल नहीं हुआ। तब उसने कृतघ्नतापूर्वक और बलपूर्वक उस गौ को अपने अधीन कर लिया। वह गौ राजा के सेवकों को झटक का अपने स्वामी के पास चली गई और कहने लगी कि उन्होंने उसका त्याग क्यों किया है। ब्रह्मर्षि ने उत्तर दिया कि वह उसका त्याग नहीं कर रहे हैं, पर राजा उनसे कहीं अधिक बलवान है। गौ उत्तर देती है, 'लोग क्षत्रिय के बल को नहीं स्वीकार करते। ब्राह्मण ही अधिक बलवान होते हैं। ब्राह्मण का बल दिव्य होता है। वह क्षत्रिय-बल से श्रेष्ठ होता है। आपका बल असीम है। भले ही विश्वामित्र महापराक्रमी है, पर आपसे अधिक बलवान नहीं है। आपका तेज दुर्घर्ष है। आपने मुझे ब्रह्म-बल से प्राप्त किया है। आप तो केवल मुझे आज्ञा दीजिए। मैं इस दुरात्मा राजा के गर्व, बल और उद्यम को अभी नष्ट किए देती हूं।' गौ ने तब रंभाकर सैकड़ों पहलवानों की सृष्टि कर दी। उन्होंने विश्वामित्र की सारी सेना का संहार कर दिया। इसके बदलने में विश्वामित्र ने उनका संहार कर दिया। तब गौ ने पुनः यवनों और शकों की सृष्टि कर दी, जो महापराक्रमी और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थे। उन्होंने विश्वामित्र की सारी सेना को भस्म कर डाला। पर विश्वामित्र ने उन वीरों को भी पराजित कर दिया। तब गौ ने रंभाकर अपने शरीर के उन विभिन्न भागों से विभिन्न प्रजातियों के अनेक योद्धाओं की सृष्टि की। उन्होंने पैदल सैनिकों, हाथियों, घोड़ों और रथ - सहित विश्वामित्र की समूची सेना का तत्काल संहार कर डाला। अपनी सेना की यह दशा देखकर विश्वामित्र के सौ पुत्र अत्यंत क्रोध से भर उठे और नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्र लेकर वशिष्ठ मुनि पर टूट पड़े, पर वे महर्षि के मुख से निकली ज्वाला में जलकर भस्म हो गए। इस प्रकार जब विश्वामित्र पूर्णतया परास्त एवं पराजित हो गए तो उन्होंने अपने एक पुत्र को अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया और हिमालय चले गए। वहां उन्होंने घोर तपस्या की और उसके द्वारा महादेव के दर्शन प्राप्त किए, जिन्होंने उनकी इच्छानुसार उन्हें युद्ध - विज्ञान के सभी अंग- उपांगों की शिक्षा दी और उन्हें दिव्य अस्त्र प्रदान किए, जिन्हें प्राप्त कर वह अभिमान से भर गए । उन्होंने वशिष्ठ के आश्रम को भस्म कर डाला और वहां के निवासी भाग खड़े हुए । वशिष्ठ ने विश्वामित्र को चुनौती दी ओर उन्होंने अपना ब्रह्मदंड उठा लिया। विश्वामित्र ने भी अपना आग्नेयास्त्र उठा लिया और चुनौती दी और कहा 'खड़ा रह ।' वशिष्ठ ने भी उसे ललकारा और कहा, 'मैं तेरा घमंड अभी धूल में मिला दूंगा। क्षत्रिय-बल और ब्राह्मण के तेज में तुलना कैसी? देख, नीच क्षत्रिय, तू मेरे दिव्य ब्रह्म तेज को देख।' गाधि पुत्र विश्वामित्र ने जिस भयंकर आग्नेयास्त्र का संधान किया था, वह वैसे ही शांत हो गया, जैसे जल से अग्नि शांत हो जाती है। तब विश्वामित्र ने अपने प्रतिद्वंदी पर ब्रह्मपाश, कालपाश, वरुणपाश, विष्णुचक्र, शिव का त्रिशूलास्त्र आदि विविध प्रकार के दिव्यास्त्र चलाए, जिन्हें ब्रह्माण के पुत्र ने अपने सर्वभक्षी ब्रह्मदंड में समाहित कर लिया। अंत में विश्वामित्र ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, जिससे सभी देवी-देवता कांप उठे। पर ब्रह्मर्षि पर वह भी निष्प्रभावी रहा । वशिष्ठ ने अब रौद्र रूप धारण कर लिया था, उनके रोमकूपों में से धूम्रयुक्त आग की लपटें निकलने लगीं और उनके हाथ में ब्रह्मदंड धूम्ररहित कालाग्नि के समान प्रज्ज्वलित हो उठा, मानों वह द्वितीय यमदंड हो । मुनियों द्वारा शांत किए जाने पर, जिन्होंने यह घोषित किया कि वह अपने प्रतिद्वंदी से श्रेष्ठ हैं, ब्रह्मर्षि ने अपना क्रोध शांत किया, विश्वामित्र हताश होकर बोले, 'क्षत्रिय के बल को धिक्कार है। ब्रह्म तेज से प्राप्त होने वाला बल ही वास्तव में बल है। आज केवल एक ही ब्रह्मदंड के द्वारा मेरे सभी अस्त्र नष्ट हो गए।' अब अपमानित और पराजित राजा के पास केवल यही विकल्प रह गया कि या तो इस असहाय हीनता को चुपचाप स्वीकार कर लें या फिर ब्राह्मणत्व के पद पर उन्नत होने के लिए प्रयत्न करें। उन्होंने दूसरे विकल्प को अपनाया और कहा : 'इस पराजय के बारे में मैंने अच्छी तरह विचार किया। अब मैं अपने मन और इंद्रियों को एकाग्र कर महान तप करूंगा, जिससे मुझे ब्राह्मणत्व की प्राप्ति हो । ' विश्वामित्र अत्यंत दुखी व संतप्त मन से अपने शत्रु के प्रति घृणा का भाव रख और उसे कोसते हुए अपनी रानी के साथ दक्षिण की ओर चले गए और वहां उन्होंने अपने संकल्प को पूरा करना आरंभ कर दिया। कहा जाता है कि उनके तीन पुत्र हुए – हविष्यांद, मधुष्यांद तथा दृढ़नेत्र । एक हजार वर्ष के बाद ब्रह्मा प्रकट हुए और उन्होंने घोषणा की कि विश्वामित्र ने राजर्षियों के लोक पर विजय प्राप्त कर ली और इस तपस्या के परिणामस्वरूप वह यह प्रमाणिज करते हैं कि विश्वामित्र ने उस पद को प्राप्त कर लिया है। विश्वामित्र इस प्रस्ताव को सुनकर लज्जित, दुखी और क्रुद्ध हो गए और बोले – 'मैंने घोर तप किया था, तो भी देवता और ऋषि मुझे राजर्षि ही समझते हैं। लगता है कि तप आदि करने से कोई लाभ नहीं होता।' इस प्रकार निराश होने पर भी उनको एक पद ऊंचा तो मिल गया था, वह पुनः घोर तपस्या में लीन हो गए ।