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अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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18 ऑक्टोबर 2023
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इस अवधि में उनकी तपस्या में निम्न घटनाओं से विघ्न पड़ा। इक्ष्वाकु के ही एक वंशज राजा त्रिशंकु के मन में एक ऐसा यज्ञ करने का विचार आया, जिसके पुण्य के बल से उन्हें सशरीर स्वर्ग की प्राप्ति हो । जब वशिष्ठ को बुलाकर राजा ने उन्हें अपना यह विचार बताया, तब उन्होंने इसे असंभव कहा। इसके बाद त्रिशंकु दक्षिण की ओर चले गए, जहां ऋषि के सौ पुत्र तप कर रहे थे। उसने उनसे वह प्रस्ताव किया, जिसे उनके पिता ने अस्वीकार कर दिया था। यद्यपि राजा ने अत्यंत श्रद्धापूर्वक और विनम्र होकर उनसे निवेदन किया था और यह कहा था कि इक्ष्वाकु संकट में अपने कुल पुरोहितों की शरण में आ हैं और उनके पिता के बाद वे अब उसके संरक्षक हैं, फिर भी उसे उन क्रोधी ऋषियों की भर्त्सना ही सुनने को मिली। उन्होंने कहा, 'आशक्यम् मूर्ख, तुम्हारे सत्यनिष्ठ गुरु ने तुम्हें मना कर दिया है। तुमने उनका निरादर कर दूसरी शाखा का आश्रय कैसे लिया। समस्त इक्ष्वाकुवंशियों के लिए कुल गुरु ही परमगति हैं। उस सत्यनिष्ठ मुनि की बात को कोई अन्यथा नहीं कर सकता। दिव्य वशिष्ठ ऋषि ने जब यह घोषित कर दिया है कि यह असंभव है, उसे हम लोग कैसे कर सकते हैं। राजन्, तुम मूर्ख हो तुम अपनी राजधानी को लौट जाओ । मुनि वशिष्ठ तीनों लोकों का यज्ञ-कर्म करने में समर्थ हैं। हम लोग उनकी अवज्ञा कैसे कर सकते हैं? त्रिशंकु ने तब कहा, 'चूंकि मेरे गुरु और गुरु के शिष्यों ने मेरी प्रार्थना को अस्वीकृत कर दिया है, अतः मैं कोई दूसरा उपाय सोचूंगा।' जब राजा ने अपनी हठ नहीं छोड़ी, तब महर्षि के पुत्रों ने उसे चांडाल होने का शाप दे दिया। यह शाप शीघ्र ही प्रभावी हो गया और जब दुखी राजा की आकृति नीच चांडाल की हो गई, तब उसने विश्वामित्र की शरण ली, जो (जैसा कि हम देख चुके हैं कि उन दिनों वह भी दक्षिण में वास कर रहे थे) अपने तपोबल को बढ़ा रहे थे और अपने भाग्य को कोस रहे थे। विश्वामित्र त्रिशंकु की दशा देखकर द्रवित हो गए और उन्होंने उसे यज्ञ कराने का आश्वासन दे दिया तथा कहा, ‘मैं तुम्हें इसी चांडाल के शरीर सहित स्वर्ग में भेजूंगा, जो तुम्हें अपने गुरु के शाप से प्राप्त हुआ है। चूंकि तुम कुशिक के पुत्र की शरण में आ गए हो, इसलिए तुम यह समझो कि तुम स्वर्ग में हो।' फिर उन्होंने यज्ञ में आमंत्रित किए जाने और वशिष्ठ के परिवार सहित सभी ऋषियों को यज्ञ में आमंत्रित किए जाने का आदेश दिया। विश्वामित्र के जो शिष्य उनका संदेश लेकर गए, उन्होंने लौटने पर इस प्रकार सूचना दी : 'आपका संदेश पाकर केवल महोदय ( वशिष्ठों) को छोड़कर प्राय: संपूर्ण देशों में रहने वाले सभी ब्राह्मण आ रहे हैं और सभी महर्षि ओ चुके हैं। वशिष्ठ के सौ पुत्रों ने क्रुद्ध हो जो कुछ कहा है, उसे आप सुनिए । वे कहते हैं कि देवता और ऋषिगण उस व्यक्ति के यज्ञ में हविष्य कैसे स्वीकार कर सकते हैं, जो चांडाल हो और जिसका यज्ञ कराने वाला आचार्य क्षत्रिय हो ? चांडाल का अन्न खाकर और विश्वामित्र के निमंत्रण पर तपस्वी ब्राह्मण स्वर्ग कैसे जा सकते हैं?' महोदय के साथ वशिष्ठ के सभी पुत्रों ने क्रोध से लाल आंखें करके ये उपर्युक्त कठोर वचन कहे। इस संदेश को सुनकर विश्वामित्र अत्यंत क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने वशिष्ठ के सभी सौ पुत्रों को भस्म होने और नीच की जाति (मृतापह) में सात सौ बार पुनः जन्म लेने और महोदय को निषाद हो जाने का शाप दे दिया। विश्वामित्र ने यह जानकर की शाप प्रभावी हो चुका है, त्रिशंकु की प्रशंसा करते हुए एकत्रित ऋषियों से यज्ञ आरंभ करने के लिए कहा। इस प्रस्ताव से वे इस डर से सहमत हो गए कि कहीं वे भी क्रोधी मुनि के कोप के भाजन न हो जाएं। उस यज्ञ में विश्वामित्र स्वयं याजक तथा अन्य ऋषि ऋत्विज हुए और सभी रीतियां संपन्न हुई। तब विश्वामित्र ने नैवेद्य अर्पित करने के लिए सभी देवताओं का आवाहन किया, परंतु वे नहीं आए। इस पर उन्हें बड़ा क्रोध आया और यह यज्ञ की स्रुवा उठाकर त्रिशंकु से इस प्रकार बोले, 'हे राजन् ! अब तुम तपस्या द्वारा अर्जित मेरा बल देखो। मैं अभी तुम्हें अपनी शक्ति से सशरीर स्वर्ग पहुंचाता हूं। तुम सशरीर स्वर्ग लोक को जाओ, जो प्राणियों के लिए दुर्लभ है। निश्चय ही मैंने अपनी तपस्या का कुछ फल प्राप्त किया है।' मुनियों के देखते-देखते राजा त्रिशंकु तुरंत सशरीर स्वर्ग लोक चले गए। लेकिन इंद्र ने उन्हें वापस जाने और सिर के बल गिरने का आदेश दिया, क्योंकि वह अपने आध्यात्मिक गुरु से शापित हैं, देवताओं के निवास स्थान में रहने के अयोग्य हैं। तदनुसार वह सिर के बल गिरने लगे और अपने आध्यात्मिक संरक्षक से सहायता करने के लिए चिल्लाने लगे। इस पर विश्वामित्र अत्यंत क्रुद्ध हो गए और उन्होंने त्रिशंकु से वहीं रुकने के लिए कहा। तब उन्होंने अपने दिव्य ज्ञान तथा तपस्या के बल से दूसरे प्रजापति की भांति आकाश के दक्षिण भाग में एक नए सप्त ऋषि मंडल की सृष्टि कर दी। आकाश के उस भाग में आने के बाद उस प्रख्यात ऋषि ने क्रुद्ध होकर अन्य ऋषियों के सम्मुख एक नए तारा मंडल की सृष्टि की। उन्होंने घोषणा की, 'मैं एक दूसरे इंद्र की सृष्टि करूंगा अथवा संसार मे कोई इंद्र नहीं रहेगा।' वह क्रोध में नए देवताओं की भी सृष्टि करने लगे। इससे ऋषि, देवता और असुर भयभीत हो उठे और विश्वामित्र ने विनयपवूक बोले कि चूंकि त्रिशंकु अपने गुरुओं द्वारा शापित हैं, अतः जब तक वह कुछ तप न कर लें, तब तक सशरीर स्वर्ग में प्रविष्ट न किए जाएं। मुनि ने कहा कि वह त्रिशंकु को वचन दे चुके हैं। उन्होंने देवताओं से अनुनय की कि वे उनके शरणागत से सशरीर स्वर्ग में रहने दें, और उन्होंने जिन नक्षत्रों का निर्माण किया है, वे सदा बने रहें । देवताओं ने सहमति प्रकट की और कहा, ‘आपके रचे हुए असंख्या नक्षत्र आकश में रहेंगे, लेकिन वे सूर्य के पथ से बाहर रहेंगे और उन्हीं के बीच में त्रिशंकु भी अमर्त्य की भांति सदा सिर के बल उल्टे टंगे रहेंगे तथा ये सभी नक्षत्र उनका अनुसरण करेंगे। इस प्रकार उनका उद्देश्य पूरा हो जाएगा, उनकी प्रतिष्ठा बनी रहेगी और वे स्वर्ग के वासी की भांति हो जाएंगे।' इस प्रकार यह महान विवाद समझौते द्वारा तय हुआ और विश्वामित्र ने इसे स्वीकार कर लिया।

Kshatriyas vs Brahmins touchables vs untouchables asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by Dr Babasaheb Ambedkar