अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
बिहार और उड़ीसा
बिहार और उड़ीसा में 1911 की जनगणना के अनुसार दलित वर्गों की आबादी, 93,00,000 थी और 1921 की जनगणना के अनुसार, 8,00,000 थी।
लेकिन बिहार तथा उड़ीसा की प्रांतीय मताधिकार कमेटी ने अपने प्रांतीय ज्ञापन¹ में कहा :
दलित वर्गों की परिभाषा के अंतर्गत आने वाली जातियों अथवा संप्रदायों की संपूर्ण सूची देना कठिन कार्य है। केवल इन वर्गों को दलित कहा जा सकता है, जैसे मुशहर, दुसाध, चमार, डोम और मेहतर। उनकी संख्या इतनी विशाल नहीं है कि एक पृथक मतदाता सूची में उनके समूहन के औचित्य को सिद्ध किया जा सके। बिहार में दलित वर्गों की समस्या बंबई अथवा दक्षिण भारत जैसी विकट नहीं है। कमेटी का विचार है कि दलित वर्गों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व की कोई जरूरत नहीं है।
पर इस कमेटी ने अपनी अंतिम रिपोर्ट² में कहा:
जिन वर्गों को आमतौर पर अस्पृश्य माना जाता है, वे हैं, चमार, दुसाध, डोम, हलालखोर, हरि, मोची, मुशहर, पानपासी । .... लेकिन कमेटी के बहुमत सदस्यों का विचार है कि दलित वर्गों के रूप में विशेष प्रतिनिधित्व दिए जाने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि उनकी शिकायतें बंबई या दक्षिण भारत जैसी विकट नहीं हैं।
क्या कारण था कि हिंदुओं ने अचालक अपना रूख बदल लिया और अस्पृश्यों की करोड़ों की आबादी नकारने का प्रयास किया? पांच करोड़ की संख्या तो 1911 के रिकार्ड में मौजूद थी। किसी ने भी उस पर आपत्ति नहीं की। क्या कारण है कि इस आंकड़े की सच्चाई को चुनौती देने का कोई कारण न होने पर भी हिंदुओं ने इतने दृढ़ निश्चय से प्रयास किया ।
जवाब सीधा-सा है। 1932 तक अस्पृश्यों का कोई राजनीतिक महत्व नहीं था। भले ही वे सामाजिक दृष्टि से हिंदू समाज की परिधि से बाहर थे, क्योंकि हिंदू समाज तो केवल चार वर्गों, अर्थात् ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शत्रूों को मान्यता देता है, पर राजनीतिक प्रयोजनों के लिए उन्हें हिंदू समाज का अंग माना जाता था। अतः राजनीतिक प्रयोजनों के लिए, जैसे विधान-मंडल आदि में प्रतिनिधित्व के लिए अस्पृश्यों की आबादी का प्रश्न कोई महत्व नहीं रखता था। 1932 तक राजनीतिक प्रश्न विधान-मंडल में केवल हिंदुओं तथा मुसलमानों के बीच सीटों के बंटवारे का प्रश्न था । साटों के बारे में ऐसा कोई प्रश्न नहीं था कि हिंदुओं के हिस्से में जो सीटें आएं, उनका बंटवारा स्पृश्यों और अस्पृश्यों के बीच हो। चूंकि पूरे का पूरा हिस्सा स्पृश्यों को मिलता था, अतः उन्होंने यह जानने की परवाह ही नहीं की कि अस्पृश्यों की आबादी कितनी थी । 1932 तक यह स्थिति पूर्णतया बदल गई। अब बंटवारे का प्रश्न हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बंटवारे का प्रश्न नहीं रह गया था। अस्पृश्य यह दावा करने लगे कि बंटवारा न केवल हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हो, बल्कि हिंदुओं को जो हिस्सा मिले, उसका और बंटवारा हो और अस्पृश्यों को उनका हिस्सा अलग से मिले और वे ही उसका उपयोग करें। अलगाव के इस दावे को मान लिया गया और अस्पृश्यों को छूट दी गई कि भारतीय गोलमेज सम्मेलन में उनके अपने सदस्य उनका प्रतिनिधित्व करें। इस प्रकार न केवल अस्पृश्यों को अलग अस्तित्व को स्वीकार किया गया, बल्कि भारतीय गोलमेज सम्मेलन की अल्पसंख्यक उप-समिति ने तो यह सिद्धांत भी स्वीकार कर लिया कि नए संविधान के अधीन दलित वर्गों को उनकी आबादी के अनुपात में सभी विधान मंडलों में प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाए। इस प्रकार अस्पृश्यों की आबादी के विषय को महत्ता प्राप्त हुई। जितनी कम आबादी अस्पृश्यों की होगी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व का उतना ही बड़ा हिस्सा स्पृश्य हिन्दुओं को प्राप्त होगा। इससे स्पष्ट हो जाएगा कि जो हिंदू 1932 से पहले अस्पृश्यों की आबादी के प्रश्न पर कोई विवाद करना नहीं चाहते थे, क्यों वे 1932 के बाद अस्पृश्य जैसे वर्ग के अस्तित्व को ही नकारने लगे।
1. आई. एफ. सी., खंड 3, पृ. 129
2. वही, खंड 3, पृ. 188
लोथियन कमेटी के सामने अस्पृश्यों की संख्या घटाने के लिए हिंदुओं ने दो दिखावटी आधारों पर जोर दिया। एक यह था कि जनगणना आयुक्त ने जो आंकड़े दिए वे दलित वर्गों के बारे में थे, अस्पृश्यों के बारे में नहीं थे, और दलित वर्ग में अस्पृश्यों के अलावा अन्य वर्ग भी शामिल थे। उनका दूसरा आधार यह था कि अस्पृश्य शब्द की व्याख्या समूचे भारत में एक जैसी होनी चाहिए और अस्पृश्यों की आबादी तय करने के लिए उसे सभी प्रांतों में लागू किया जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, उन्होंने अस्पृश्यता की स्थानीय कसौटी पर आपत्ति की ।
पहला दावा नितांत असत्य था । 'दलित वर्ग' शब्द का प्रयोग अस्पृश्यों के पर्याय के रूप में किया गया था। 'अस्पृश्य' शब्द के स्थान पर 'दलित' शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया था कि यह सोचा गया कि 'अस्पृश्य' शब्द उन लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाएगा, जिन्हें इस शब्द की परिधि में लाया जाना था। 'दलित' शब्द का प्रयोग केवल अस्पृश्यों के लिए किया गया था और इसमें आदिवासी तथा जरायम- पेशा लोग शामिल नहीं थे। यह बात उस बहस में स्पष्ट कर दी गई थी, जो 1916 में सम्राट की विधायी परिषद (इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल) में माननीय श्री दादाभाई द्वारा प्रस्तुत संकल्प पर हुई थी। सवर्ण हिंदुओं का दूसरा दावा यह था कि अस्पृश्यता की कसौटी एक जैसी होनी चाहिए। इस दावे को प्रस्तुत करने का उद्देश्य अस्पृश्यों की संख्या को कम करना था। सभी जानते हैं कि भारत के अलग-अलग भागों में अस्पृश्यता के अलग-अलग रूप हैं। भारत के कुछ भागों में अस्पृश्य दष्टिवर्जित हैं, यानी उन पर किसी स्पृश्य हिंदू की दृष्टि पड़ जाती है, तो वह अपवित्र हो जाता है। कुछ भागों में वे सामीप्यवर्जित हैं, यानी वे अपवित्र कर देते हैं यदि वे किसी स्पृश्य हिंदू के पास निश्चित दूरी के भीतर आ जाते हैं। इन सामीप्यवर्जितों के भी दो वर्ग हैं। एक वर्ग वह है, जो स्पृश्य हिंदू के पास किसी निश्चित दूरी के भीतर नहीं जा सकता। सामीप्यवर्जितों का दूसरा वर्ग वह है, जो किसी हिंदू के इतना निकट नहीं जा सकता कि उसकी छाया हिंदू पर पड़ जाए। भारत के कुछ भागों में अस्पृश्य दृष्टिवर्जित या सामीप्यवर्जित नहीं है। केवल उसका शारीरिक स्पर्श ही अपवित्र करता है। कुछ भागों में अस्पृश्य वह है, जिसे जल या अन्न को छूने नहीं दिया जाता। कुछ भागों में अस्पष्य वह है, जिसे मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया जाता। इन भिन्नताओं से यह स्पष्ट है कि यदि दृष्टिवर्जनीयता को ही अस्पृश्यता की एकमात्र कसौटी माना जाए, तो सामीप्यवर्जितों को अस्पृश्यों की श्रेणी से अलग करना होगा। यदि सामीप्यवर्जनीयता को कसौटी माना जाए, तो स्पर्श मात्र से अपिवत्र करने वालों को अस्पृश्यों की श्रेणी से अलग करना होगा। यदि स्पर्श द्वारा अपवित्र को कसौटी माना जाए तो उन लोगों को अलग करना होगा, जो जल या अन्न नहीं छू सकते। हिंदू यही करना चाहते थे। एक जैसा कसौटी पर आग्रह करके वे कतिपय वर्गों को अस्पृश्यों की श्रेणी से अलग करना चाहते थे, जिससे कि अस्पृश्यों की संख्या कम हो जाए। जाहिर है कि उनका दृष्टिकोण भ्रामक था। अस्पृश्यता किसी व्यक्ति के प्रति किसी हिंदू की आंतरिक घृणा की बाह्य अभिव्यक्ति है। यह घृणा कैसा रूप धारण करती है, वह अपेक्षतः एक नगण्य मामला है। रूप तो केवल घृणा की मात्रा को दर्शाता है। घृणा है जहां, अस्पृश्यता है वहां। यह सहत सत्य हिंदुओं से छिपा नहीं था ।
पर वे जोरशोर से कसौटी की एकरूपता का राग अलापते रहे, क्योंकि वे चाहते थे कि जैसे भी हो, अस्पृश्यों की संख्या को कम किया जाए और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बड़े हिस्से को हड़प लिया जाए।