अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
V
इसमें संदेह नहीं कि हिंदुओं और अस्पृश्यों के संघर्ष पर मुख्य उपाख्यान आधारित है। पर इस उपाख्यान के भीतर एक और उप-कथा है, जो महत्व से भरपूर है। यह है, पिछड़े वर्गों तथा अस्पृश्यों के बीच का संघर्ष पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधियों का कहना था कि दलित वर्ग नामक श्रेणी में उस शब्द के सीमित अर्थ के अनुसार केवल अस्पृश्यों को ही शामिल न किया जाए, अपितु आर्थिक तथा शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को भी शामिल किया जाए। जो लोग यह चाहते थे कि न केवल अस्पृश्यों को, बल्कि शैक्षिक तथा आर्थिक दृष्टि से पिछड़े लोगों को भी अलग प्रतिनिधित्व दिया ही जाना चाहिए, उनका यह उद्देश्य प्रशंसनीय था । अपने इस सुझाव के द्वारा वे किसी नई चीज की मांग नहीं कर रहे थे। 1920 में जो संशोधित संविधान लागू हुआ, उसके अनुसार भारत के दो प्रांतों, अर्थात् बंबई और मद्रास, में आर्थिक तथा शैक्षिक दृष्टि से पिछड़ी जातियों के अधिकार को मान्यता दी गई। बंबई में मराठों तथा संबद्ध जातियों को और मद्रास में गैर-ब्राह्मणों को केवल इस आधार पर कि वे शैक्षिक तथा आर्थिक दृष्टि से पिछड़े थे, अलग प्रतिनिधित्व दिया गया। आशंका यह थी कि इन जातियों को विशेष प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया, तो सवर्ण हिंदुओं के अल्पसंख्यक जैसे ब्राह्मण तथा संबद्ध जातियां राजनीति के क्षेत्र में उनका दमन करेंगी। अन्य प्रांतों में भी ऐसी ही स्थिति वाली अनेक जातियां हैं। उन्हें विशेष राजनीतिक प्रतिनिधित्व की जरूरत है, ताकि उच्च जातियां उनका दमन न कर सकें। अतः हिंदुओं में से पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधियों दावा पूर्णतया उचित ही था कि उनके लिए विशेष प्रतिनिधित्व प्रदान किया जाए¹ । यदि उनके दृष्टिकोण को स्वीकार कर लिया जाता तो दलित वर्गों के लोगों की संख्या में भारी वृद्धि हो जाती। लेकिन उन्हें अस्पृश्यों अथवा सवर्ण हिंदुओं से कोई समर्थन नहीं मिला। हिंदू ऐसे किसी भी प्रयास के विरुद्ध थे, जिसका उद्देश्य दलित वर्गों की संख्या में वृद्धि करना हो । अस्पृश्य यह नहीं चाहते थे कि उनकी श्रेणी में किसी ऐसे वर्ग के लोगों को शामिल किया जाए, जो वास्तव में अस्पृश्य न हो। इन पिछड़ी जातियों के लिए उचित मार्ग यही था कि वे मांग करते कि स्पृश्य हिंदुओं का विभाजन उन्नत तथा पिछड़े लोगों के रूप में किया जाए, और पिछड़े लोगों को अलग से प्रतिनिधित्व दिया जाए। उस प्रयास में अस्पृश्य उनका समर्थन करते। लेकिन वे इसके लिए सहमत नहीं हुए और आग्रह करते रहे कि उन्हें दलित वर्गों में शामिल किया जाए। उसका मुख्य कारण यह था कि उनका विचार था कि यह उनके उद्देश्य को पूरा करने का आसान तरीका था। लेकिन चूंकि अस्पृश्यों ने इसका विरोध किया, अतः पिछड़े वर्ग विमुख हो गए और उन्होंने हिंदुओं से भी अधिक उग्र रूप से अस्पृश्यों के अस्तित्व को नकारने में हिंदओं का साथ दिया।
1. संयुक्त प्रांत में पिछड़े वर्गों के लिए ऐसी व्यवस्था की जरूरत थी। यह मांग भी मुख्यतः वहीं से की गई थी। साइमन कमीशन को दिए गए अपने ज्ञापन में संयुक्त प्रांत की सरकार ने जो कहा है, उसमें यह जरूरत पर्याप्त रूप से स्पष्ट हो जाती है। संयुक्त प्रांत के विधान-मंडल के गठन के बारे में उसमें कहा गया है। 'समग्र रूप से प्रांत में कुल हिंदू आबादी का 21.5 प्रतिशत भाग चार प्रमुख हिंदू जातियों, यानी ब्राह्मणों, ठाकुरों वैश्यों और कायस्थों का है, लेकिन इन चार जातियों में से कौंसिल में 93 प्रतिशत के लगभग हिंदू सदस्य आए हैं। आबादी का 1.8 प्रतिशत भाग जाटों का है। उसमें से और पांच प्रतिशत हिंदू सदस्य आए हैं। अन्य हिंदू जातियों के असंख्य लोगों में शामिल करोड़ों लोग जिनमें वास्तव में काश्तकार जातियां भी हैं, भले ही वे हिंदू आबादी का 76 प्रतिशत भाग हैं, केवल दो प्रतिशत प्रतिनिधित्व प्राप्त कर सकते हैं।' पृ. 500
स्पृश्यों और अस्पृश्यों के इस संघर्ष में अस्पृश्यों को मुसलमानों से कोई समर्थन नहीं मिला। इस ओर ध्यान देना होगा कि पंजाब प्रांत की मताधिकार कमेटी में केवल एक मुसलमान ने अस्पृश्यों के प्रतिनिधि के उस आग्रह का समर्थन किया कि पंजाब में ऐसी जातियां हैं, जिन्हें अस्पृश्य माना जाता है। कमेटी के शेष मुस्लिम सदस्यों ने समर्थन नहीं किया। बंगाल में बंगाल प्रांत की मताधिकार कमेटी के हिंदू तथा मुस्लिम सदस्य इस बारे में सहमत हो गए कि वे इस मामले पर कोई विचार व्यक्त नहीं करेंगे। यह कैसी अजीब बात है कि मुसलमान सदस्यों ने चुप्पी साध ली। यह तो उनके हित में था कि अस्पृश्यों को पृथक राजनीतिक समुदाय के रूप में स्वीकार किया जाए। स्पृश्यों तथा अस्पृश्यों का यह अलगाव उनके हित में था। संख्या वृद्धि के इस संघर्ष में मुसलमानों ने अस्पृश्यों की क्यों मदद नहीं की? मुसलमानों के इस रवैए के दो कारण थे। एक तो यह है कि मुसलमान अपनी आबादी के अनुपात से कहीं अधिक प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे थे। भारत की राजनीतिक शब्दावली के अनुसार वे अधिप्रतिनिधित्व की मांग कर रहे थे। वे जानते थे कि उनके अधिप्रतिनिधित्व से निश्चय ही हिंदुओं को घाटा होगा और प्रश्न केवल यह था कि हिंदुओं का कौन-सा वर्ग वह घाटा उठाए। स्पृश्य हिंदू इस अधिप्रतिनिधित्व की परवाह नहीं करेंगे, यदि वह उनके हिस्से में कमी किए बिना दिया जा सके। समस्या यह थी कि इसे कैसे किया जाए, और इसका एकमात्र रास्ता यही था कि अस्पृश्यों का हिस्सा कम कर दिया जाए, हिस्सा कम करने का अर्थ था, संख्या को कम करना। एक कारण तो यह है, जिसकी वजह से संख्या के इस संघर्ष में मुसलमानों ने अस्पृश्यों का साथ नहीं दिया। दूसरा कारण यह था कि मुसलमानों को डर था कि हिंदू उनका पर्दाफाश कर देंगे । यद्यपि इस्लाम एक ऐसा धर्म है, जो जाति और रंग को लांघकर अलग-अलग लोगों को भाईचारे की डोर में बांध सकता है, फिर भी भारत में इस्लाम भारतीय मुसलमानों में से जाति को निर्मूल करने में सफल नहीं हो सका है। मुसलमानों में जातीयता की भावना उतनी उग्र नहीं है, जितनी की हिंदुओं में है। लेकिन यह असलियत है कि उनमें वह भावना है। मुसलमानों में इस जातीयता की भावना से सामाजिक वर्गीकरण होता है और यह भारत में मुस्लिम संप्रदाय की विशिष्टता है, इस ओर उन सभी लोगों का ध्यान गया है, जिन्हें इस विषय के अध्ययन का अवसर मिला है। बंगाल के जनगणना आयुक्त ने अपनी रिपोर्ट में कहा है :
(उद्धरण पांडुलिपि में दर्ज नहीं है – संपादक)
हिंदू इन तथ्यों से भली-भांति अवगत हैं और वे मुस्लिमों के खिलाफ उन्हें उद्धृत करने के लिए पूर्णतया तैयार थे, यदि मुस्लिम हद से आगे बढ़कर संख्या के इस संघर्ष में अस्पृश्यों का साथ देते और उसके कारण विधान-मंडल में सवर्ण हिंदुओं की सीटें घट जातीं। मुसलमान अपने कमजोर पक्षों को जानते थे। वे नहीं चाहते थे कि हिंदुओं को बहाना मिले और वे मुसलमानों के बीच सामाजिक फूट को भड़काएं। उन्होंने सोचा कि उनका सर्वोत्तम हितसाधन तटस्थ रहने में होगा ।
इस प्रकार अपनी संख्या के संघर्ष में अस्पृश्य अकेले पड़ गए। लेकिन उन पर भी ध्येयपूर्ति के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता था। जब हिंदुओं ने देखा कि वे अस्पृश्यों की संख्या घटाने में सफल नहीं हो सकते, तो उन्होंने अस्पृश्यों को गुमराह करने की कोशिश की। वे अस्पृश्यों से कहने लगे कि सरकार अस्पृश्य जातियों की सूची तैयार कर रही है और ऐसी सूची में किसी जाति का नाम दर्ज कराना गलत होगा, क्योंकि इससे उन पर सदा के लिए अस्पृश्यता का ठप्पा लग जाएगा। उनकी सलाह मानकर अनेक जातियों ने जो वास्तव में अस्पृश्य जातियां थीं, याचिका भेजकर कहा कि वे अस्पृश्य वर्ग की नहीं हैं और उनका नाम सूची में दर्ज न किया जाए। ऐसी याचिकाओं को वापस ले लिए जाने की प्रेरणा देने के लिए ऐसी जातियों से काफी माथापच्ची करनी पड़ी। उन्हें सूचित किया गया कि असली उद्देश्य उनकी संख्या का आकलन करने का है, ताकि विधान मंडल में उनकी सीटों की संख्या तय की जा सके।
सभी के लिए सौभाग्य की बात है कि यह संघर्ष और विवाद अब समाप्त हो चुका है। अब अस्पृश्यों की संख्या के बारे में कभी भी विवाद नहीं उठाया जा सकता। अब कानूनी तौर पर अस्पृश्यों की परिभाषा कर दी गई है। कौन अस्पृश्य हैं, इसकी व्यवस्था भारत सरकार अधिनियम, 1935 की एक अनुसूची में कर दी गई है और उसमें उन्हें अनुसूचित जातियों के रूप में दर्शाया गया है। लेकिन संघर्ष हिंदू चरित्र की प्रवृत्ति को उजागर करता है। यदि अस्पृश्य कोई आवाज नहीं उठाता तो हिंदू उसकी दशा पर लज्जित नहीं होता और उनकी संख्या के बारे में उदासीन रहता है। चाहे वे हजारों में हों या करोड़ों में, उसे इससे कोई सरोकार नहीं। लेकिन यदि अस्पृश्य आवाज उठाते हैं और मान्यता की मांग करते हैं, तो वह इसके लिए कमर कस लेता है कि उनके अस्तित्व को नकार दें, अपने दायित्व को न ओढ़े, अपने अधिकार का बंटवारा न करे और दया तथा ममता से किनारा कर ले।