अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
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पानी प्राप्त करने के सार्वजनिक स्थानों से पानी लेने का अधिकार पाने के लिए जो प्रयास किए गए, उनमें चावदार तालाब के मामले का उल्लेख पर्याप्त होगा।
यह चावदार तालाब बंबई प्रेसिडेंसी के कोलाबा जिले के महाड नगर में स्थित है। यह एक अति विशाल तलाब है। इसमें मुख्यतः वर्षा का और कुछ प्राकृतिक स्रोतों का पानी आता है। तालाब के चारों ओर तटबंध है। तालाब के चारों ओर व्यक्तिगत स्वामित्व वाली जमीन की छोटी-छोटी पट्टियां हैं। जमीन की इस पट्टी के परे तालाब के चारों ओर नगरपालिका की सड़क है। सड़के के परे स्पृश्यों के अपने निजी मकान हैं। तालाब हिंदू क्षेत्रों के बीचों-बीच स्थित है और हिंदू भवनों से घिरा है।
यह एक प्राचीन तालाब है। कोई नहीं जानता कि उसे किसने और कब बनवाया। लेकिन 1869 में जब सरकार ने महाड नगर के लिए नगरपालिका की स्थापना की, तो सरकार ने उसे नगरपालिका को सौंप दिया। तब से उसे नगरपालिका का तालाब, यानी सार्वजनिक तालाब माना जाता है।
महाड एक व्यावसायिक केंद्र है। वह तालुका का प्रधान कार्यालय भी है। अस्पृश्यों को वहां खरीदारी करने तथा ग्राम सेवके के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के लिए आना पड़ता था । वे तालुका के अधिकारी को या तो ग्राम अधिकारी द्वारा भेजी गई चिट्ठी-पत्री देते थे या फिर ग्राम अधिकारी द्वारा एकत्र किया गया लगान सरकारी खजाने में जमा करते थे। चावदार तालाब ही एकमात्र ऐसा तालाब था, जहां से बाहर से आने वाला कोई व्यक्ति पानी ले सकता था। लेकिन अस्पृश्यों को इस तालाब से पानी लेने नहीं दिया जाता था। अस्पृश्यों को पानी केवल महाड नगर के अस्पृश्यों के क्षेत्रों में स्थित कुएं से ही मिल सकता था। यह कुआं नगर के मध्य से कुछ दूरी पर था । नगरपालिका की उपेक्षा के कारण वह गंदगी से अटा पड़ा था।
अतः पानी के मामले में अस्पृश्यों का काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता था। मामला सुधरने तक यह सब चलता रहा। 1923 में बंबई की विधान परिषद् ने आशय का संकल्प पारित किया कि अस्पृश्य वर्गों को छूट दी जाए कि वे उन सभी सार्वजनिक जलाशयों, कुओं, धर्मशालाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिनका निर्माण और रखरखाव सार्वजनिक निधि से किया जाता हो या जो सरकार द्वारा नियुक्त या कानूनी तौर पर बनाए गए निकायों की देखरेख में हों। यह भी कहा गया कि वे सरकारी स्कूलों, अदालतों, कार्यालयों और डिस्पेंसरियों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं। सरकार ने यह संकल्प स्वीकार कर लिया और यह आदेश जारी कर दिया :
परिषद के पूर्वोक्त संकल्प के अनुसार बंबई सरकार सहर्ष यह निर्देश देती है कि जहां तक संकल्प का संबंध सरकारी स्वामित्व और देखरेख वाले सार्वजनिक स्थलों, संस्थाओं से है, कार्यालयों के सभी अध्यक्ष उसे लागू करें। कलेक्टरों से अनुरोध किया जाए कि वे अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले स्थानीय निकायों को सलाह दें कि वे संकल्प में की गई सिफारिशों को स्वीकार करने की वांछनीयता पर विचार करें।
सरकार के इस आदेश के अनुसार कोलाबा के कलेक्टर ने महाड नगरपालिका के विचारार्थ उसकी एक प्रति भेजी । महाड नगरपालिका ने 5 जनवरी, 1924 को इस आशय का संकल्प पारित किया कि नगरपालिका को इस बारे में कोई आपत्ति नहीं है कि अस्पृश्यों को तालाब का इस्तेमाल करने दिया जाए। इस संकल्प के पास हो जाने के शीघ्र पश्चात् महाड में कोलाबा जिले के अस्पृश्यों का एक सम्मेलन मेरी अध्यक्षता में हुआ। सम्मेलन की बैठक दो दिन 18 और 20 मार्च, 1927 को हुई। कोलाबा जिले में अस्पृश्यों का यह सर्वप्रथम सम्मेलन था। सम्मेलन में 2,500 से अधिक अस्पृश्यों ने हिस्सा लिया। उनमें बड़ा उत्साह था। सम्मेलन के प्रथम दिवस पर मैंने अध्यक्ष पद से अपना भाषण दिया। उसमें मैंने उन्हें प्रेरणा दी कि वे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करें, वे अपनी गंदी तथा बुरी आदतों को त्याग दें और मानवता की पूरी बुलंदी को स्पर्श करें। उसके बाद वहां उपस्थित तथा अस्पृश्यों की दोस्ती का दम भरने वाले सवर्ण हिंदुओं ने सभा को संबोधित किया। उन्होंने अस्पृश्यों से कहा कि वे साहस से काम लें और और अपने कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करें। इसके साथ पहले दिन की कार्यवाही समाप्त हुई। रात को विषय समिति की बैठक हुई। उसमें विचार किया गया कि अगले दिन खुले सम्मेलन में क्या संकल्प प्रस्तुत किया जाए। विषय समिति में कुछ लोगों ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया कि पीने का पानी प्राप्त करने में अस्पृश्यों को महाड में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। खासकर यह कठिनाई सम्मेलन की स्वागत समिति के सदस्यों ने अनुभव की । उन्हें सम्मेलन में भाग लेने वाले के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी मंगाने के लिए सवर्ण हिंदुओं को लगाना पड़ा और 15 रुपये की विपुल राशि खर्च करनी पड़ी।
अगले दिन 20 तारीख को प्रायः 9 बजे सम्मेलन की बैठक हुई। उसमें विषय समिति द्वारा तय संकल्प प्रस्तुत किए गए। सम्मेलन ने उन्हें पास कर दिया। इसमें कुल मिलाकर कोई तीन घंटे लगे। अंत में मेरे एक सहयोगी ने अध्यक्ष तथा सम्मेलन को सफल बनाने वाले अन्य लोगों के प्रति धन्यवाद का प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए जल-प्राप्ति की कठिनाई के प्रश्न का उल्लेख का प्रस्ताव उपस्थित अस्पृश्यों को प्रोत्साहित किया कि वे चावदार तालाब पर जाकर पानी लेने के अधिकार का इस्तेमाल करें, खासकर उस स्थिति में जब कि नगरपालिका ने अपने संकल्प द्वारा घोषणा कर दी है कि वह अस्पृश्यों के लिए खुल गया है और उनके हिंदू मित्र उनकी मदद करने को तैयार हैं। जिन हिंदुओं ने उन्हें प्रोत्साहित किया था कि वे निर्भय होकर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने लगें, उन्होंने तत्काल अनुभव किया कि यह तो विस्फोटक स्थिति पैदा हो गई है और वे तुरंत भाग खड़े हुए। लेकिन अस्पृश्यों पर इसका भिन्न प्रभाव पड़ा। इस ललकार से तो उनकी रंगों में जैसे बिजली दौड़ गई। वे एकजुट होकर खड़े हो गए और मेरे तथा मेरे सहयोगियों के नेतृत्व में 2,500 अस्पृश्य लोगों के जत्थे ने मुख्य सड़कों पर जुलूस निकाला। यह समाचार दावाग्नि की भांति फैल गया और जुलूस देखने के लिए सड़कों पर लोगों की भीड़ जमा हो गई।
नगर के हिंदुओं ने यह दृश्य देखा। वे अवाक रह गए। उनके लिए यह एक अभूतपूर्व दृश्य था । कुछ क्षणों के लिए तो लगा कि वे स्तब्ध रह गए थे। चार-चार की कतार में जुलूस चलता रहा। वह चावदार तालाब पर पहुंचा। अस्पृश्यों ने पहली बार वहां पानी पीया। शीघ्र ही हिंदुओं ने अनुभव किया कि यह सब क्या हो गया। उन पर पागलपन सवार हो गया और उन्होंने उन अस्पृश्यों पर जी-भर का जुल्म ढाए, जिन्होंने पानी को भ्रष्ट करने का दुस्साहस किया था। उनके अत्याचारों का उल्लेख उपयुक्त स्थानों पर किया जाएगा।