अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
III
सीधी कार्यवाही के इस इतिहास में जो दूसरा उल्लेखनीय प्रयास है, उसका संबंध नासिक के कालाराम मंदिर नामक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर में अस्पृश्यों के प्रवेश से है। सीधी कार्यवाही के ये वे उदाहरण हैं, जिनका लक्ष्य विशिष्ट प्रयोजनों की प्राप्ति था । इस आंदोलन में सीधी कार्यवाही के दो मामले शामिल हैं। उनका उद्देश्य था कि हिंदू समाज-व्यवस्था को बारूद लगाकर समूल नष्ट कर दिया जाए। एक तो 'मनुस्मृति' का जलाया जाना है। दूसरा है कि अस्पृश्यों ने सामूहिक रूप से कह दिया कि वे न तो हिंदुओं के मृत पशुओं को उठाएंगे और न ही उनकी खाल उतारेंगे।
'मनुस्मृति' को महाड में 20 दिसंबर, 1927 का जलाया गया। यह समारोह इस अभियान का अंग था कि चावदार तालाब से पानी लेने के अधिकार को स्थापित किया जाए। 'मनुस्मृति' को खुलेआम सार्वजनिक रूप से जलाया गया। इस अवसर पर अस्पृश्यों का एक सम्मेलन हुआ। 'मनुस्मृति' को जलाने से पूर्व सम्मेलन ने कतिपय संकल्प पारित किए। इन संकल्पों ने अस्पृश्यों के आंदोलन के इतिहास में एक कीर्तिमान स्थापित किया है। अतः उन्हें नीचे उद्धृत किया जाता है :
संकल्प संख्या 1 - हिंदू के अधिकारों की घोषणा
इस सम्मेलन का यह दृढ़ मत है कि हिंदू समाज की वर्तमान दयनीय दशा केवल यह दर्शाती है कि किस प्रकार किसी समाज का पतन हो जाता है, जब वह सामाजिक अन्याय को सहन करने लगता है, गलत धार्मिक आस्थाओं का अनुसरण करने लगता है और आर्थिक अन्यायों का समर्थन करने लगता है। हिंदू समाज का पतन केवल इस कारण हुआ है कि आम लोगों ने यह जानने की चेष्टा नहीं की है कि किसी मानव के जन्मसिद्ध अधिकार क्या हैं। इसकी भी उन्होंने चेष्टा नहीं की है कि उन्हें मान्यता मिले और स्वार्थी लोगों के घटिया कारनामों और कुकृत्यों की अवज्ञा की जाए। हर व्यक्ति का यह पुनीत कर्तव्य है कि वह जाने कि मानव के ये जन्मसिद्ध अधिकार क्या हैं, वह यह देखने का प्रयास करे कि मानव और मानव तथा वर्ग और वर्ग के बीच इस संघर्ष में वे पैरों तले कुचले न जाएं। हो सकता है कि हर हिंदू को यह पता न हो कि सम्मेलन की राय में मानव के जन्मसिद्ध अधिकार क्या हैं। अतः यह सम्मेलन संकल्प करता है कि वह उनकी सूची वाली निम्न उद्घोषणा जारी करे
(i) सभी हिंदुओं की सामाजिक हैसियत जन्म से एक जैसी होती है। सामाजिक हैसियत की यह समता उनका एक ऐसा गुण है, जो मृत्यु पर्यन्त बना रहता है। हो सकता है कि समाज में उनके कृत्यों की दृष्टि से उनमें विभेद और अंतर हो। लेकिन उनके करण उनकी हैसियत में कोई अंतर नहीं होने चाहिएं। अतः यह सम्मेलन ऐसे किसी भी कार्य का विरोध करता है, भले ही वह जीवन के राजनीतिक, आर्थिक अथवा सामाजिक क्षेत्र में हों, जिसके कारण सामाजिक हैसियत में अंतर पैदा होता हो। (ii) सभी राजनीतिक, आर्थिक अथवा सामाजिक परिवर्तनों का अंतिम लक्ष्य यही होना चाहिए कि सभी हिंदुओं की समान हैसियत ज्यों की त्यों बनी रहे। सम्मेलन का यह दृष्टिकोण है, अतः वह हिंदुओं के ऐसे समूचे साहित्य का, चाहे वह प्राचीन हो या आधुनिक, घोर विरोध करता है, जो हिंदू समाज-व्यवस्था में व्याप्त असमानता के घृणित सिद्धांत को किसी भी प्रकार समर्थन करता है।
(iii) समस्त सत्ता की स्रोत है, जनता किसी व्यक्ति अथवा वर्ग का विशेषाधिकारों का दावा तब तक वैध नहीं होता, जब तक उसे जनता मान्यता न दे। अतः यह सम्मेलन हिंदुओं के कुछ वर्गों को प्राप्त सामाजिक तथा धार्मिक विशेषाधिकारों का खंडन करता है, क्योंकि वे वेदों, स्मृतियों और पुराणों पर आधारित हैं, न कि स्वतंत्र लोक मत पर।
(iv) हर व्यक्ति का यह जन्मसिद्ध अधिकार है कि उसे काम करने और बोलने की आजादी हो। इस आजादी पर केवल इसलिए अंकुश लगाया जा सकता है कि उसकी आजादी किसी अन्य व्यक्ति के अधिकार में बाधा न डाले । इसके अलावा यह अंकुश केवल जनादेश से लगाया जा सकता है, हिंदू शास्त्रों की किसी निषेधाज्ञा से नहीं । अतः सम्मेलन धार्मिक, सामाजिक एवं आर्थिक आजादी संबंधी उन सभी प्रतिबंधों का खंडन करता है, जो हिंदुओं के विचार और कर्म पर लगाए गए हैं, क्योंकि उन्हें शास्त्रों ने लगाया है, जनता ने नहीं।
(v) हिंदुओं को जन्मसिद्ध अधिकारों के अलावा उनके अन्य अधिकारों से केवल कानून द्वारा ही वंचित किया जा सकता है। कानून जिसका निषेध नहीं करता, उसे करने की पूरी छूट हिंदू को होनी ही चाहिए और कानून जिसे बाध्यकारी नहीं ठहराता उसे करने के लिए हिंदू को बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। इस कारण व्यक्तियों के लिए ऐसी कोई रोक ही नहीं होनी चाहिए कि वे सार्वजनिक मंदिरों तथा अन्य सार्वजनिक सुविधाओं का उपयोग नहीं कर सकते। जिन मामलों पर कानून ने रोक नहीं लगाई है, उनमें जो रोक लगाते हैं, वे सम्मेलन की राय में जन-शत्रु
(vi) कानून किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का आदेश नहीं है। कानून तो परिवर्तन के लिए जनादेश है। ऐसी स्थिति में श्रद्धास्पद कानून को सबकी सहमति से ही बनाया जाए और निश्चय ही उसे बिना किसी भेदभाव के सब पर लागू किया जाए। जरूरी होने पर सामाजिक विभाजन समाज के हित में किए जा सकते हैं, लेकिन उसका एकमात्र आधार योग्यता (कर्म) हो, न कि जन्म। यह सम्मेलन हिंदू समाज - व्यवस्था का खंडन एक तो इस आधार पर करता है कि वह समाज का अहित करती है। दूसरा आधार यह है कि वह जन्म पर आधारित है। तीसरा यह कि उसे कोई जनादेश प्राप्त नहीं है।