अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
दलितों के अबी दुबोई जैसे महान मित्र ने भी मद्रास प्रेसिडेंसी के पेरियाओं (अस्पृश्यों) के बारे में लिखा है। :
अन्य मूल निवासियों के लिए मुख्य घृणा का विषय पेरियाओं का घिनौना भोजन है। सड़े-गले मांस की गंध से आकर्षित होकर उनकी भीड़ मृत पशु के चारों ओर एकत्र हो जाती है और वे उस सड़े मांस के लिए कुत्तों, गीदड़ों, कौओं तथा अन्य मांसाहारी पशुओं से हाथापाई करते हैं। फिर वे अर्ध-सड़े मांस को बांटकर अपनी-अपनी झोपडियों में ले जाते हैं। वहां वे उसे खाते हैं और प्रायः उसकी गंध को कम करने वाले किसी पदार्थ या भात के बिना ही चट कर जाते हैं। उन्हें इसकी परवाह नहीं होती कि पशु किसी रोग से ग्रस्त होकर मरा है। कभी-कभी तो वे चुपचाप गायों अथवा भैंसों को विष देकर मार डालते हैं, ताकि वे बाद में सड़े-गले अवशेषों की दावत उड़ा सकें। गांव में मरने वाले पशु के शव पर तोटी अथवा झाडू लगाने वाले का अधिकार होता है। वह उस मांस को बड़ी सस्ती कीमत पर पड़ोस के पेरियायों को बेच देता है। इस प्रकार प्राप्त मांस को जब वे एक दिन में नहीं खा पाते, तो वे शेष मांस को धूप में सुखा देते हैं और उसे अपनी झोंपड़ी में किसी आड़े वक्त के लिए रख लेते हैं। पेरियाओं के चंद घर ही ऐसे होते हैं, जहां इन घिनौने मांस के लोथड़ों की बंदनवार नहीं लटकी होती। भले ही स्वयं पेरियाओं पर इस दुर्गंध का प्रभाव नहीं दीख पड़ता, लेकिन उनके ग्राम के पास से गुजरने वाले यात्री तुरंत ही उसे पहचान लेते हैं और वे तुरंत ही बता सकते हैं कि वहां किस जाति के लोग रह रहे हैं।
अभी जो कुछ बताया गया है, उसके बाद क्या हम इस बात पर अचरज कर सकते हैं कि अन्य जातियां उनसे घृणा करती हैं? क्या उनकी निंदा इस बात के लिए की जा सकती है कि वे इन बर्बरों से कोई वास्ता नहीं रखते अथवा उन्हें बाध्य करते हैं कि वे स्वयं को अलग-थलग रखें और अलग घरों में रहें।
यह सच है कि इस धंधे ने हिंदुओं के मानस में उनक प्रति घृणा पैदा कर दी है। लेकिन अबी अथवा उनके तर्क को मानने वाले लोग दो अति महत्वपूर्ण प्रश्न उठाना भूल जाते हैं। एक तो यह कि अस्पृश्य सड़ा-गला मांस क्यों खाते हैं? क्या अस्पृश्यों को हिंदू इस बात की छूट देंगे कि वे उनके मृत पशुओं को उठाना और उनकी खाल उतारना बंद कर दें? पिछले एक अध्याय में इस प्रश्न का उत्तर दिया जा चुका है कि अस्पृश्य सड़ा-गला मांस क्यों खाते हैं?
यदि ताजा मांस उपलब्ध हो तो कोई भी सड़ा-गला मांस खाना पसंद नहीं करेगा । अस्पृश्य सड़ा-गला मांस खाकर जिंदा रहते हैं, इसका कारण यह नहीं है कि वे उससे पसंद करते हैं। वे सड़ा-गला मांस इसलिए खाते हैं कि उनके पास जिंदा रहने के लिए और कोई साधन नहीं है। अस्पृश्यता के कारण उनके पास जीवन - निर्वाह का अन्य कोई उपाय नहीं होता। जो लोग इसे अनुभव करते हैं, उन्हें इस बात को समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी। सभी धंधों के द्वार उनके लिए बंद होते हैं। उनके पास न तो भूमि होती है, जिनकी पैदावार पर वे जिंदा रहे सकें। वे कोई व्यापार भी नहीं कर सकते। अतः उनके जीवन का मुख्य आधार वह भोजन होता है, जो वे गांव वालों से एकत्र करते हैं। इसके अलावा तो सड़ा-गला मांस ही उनके लिए शेष रहता है। सड़े-गले मांस के अभाव में तो वस्तुत: भूखे ही मर जाएंगे। अतः यह स्पष्ट है कि दोष अस्पृश्यों का नहीं है। यदि वे सड़ा-गला मांस खाते हैं, तो उसका कारण यह है कि हिंदुओं ने रोजी-रोटी कमाने का कोई सम्मानजनक रास्ता उनके लिए छोड़ा ही नहीं है।
दूसरे प्रश्न का उत्तर भी उतना ही स्पष्ट है। यदि अस्पृश्य लोग हिंदुओं के मृत पशुओं को उठाते हैं और उनकी खाल उतारते हैं, तो उसका कारण यह है कि उनके पास और कोई विकल्प नहीं होता। उन्हें विवश होकर ऐसा करना पड़ता है। यदि वे ऐसा करने से इंकार करते हैं तो उन पर जुर्माना किया जाता है। जुर्माना वैध है। कुछ प्रांतों में इस घिनौने काम को करने से इंकार करना ठेके को भंग करना है। अन्य प्रांतों में यह दंडनीय अपराध है और जुर्माना किया जा सकता है। बंबई जैसे प्रांतों में अस्पृश्य गांव के सेवक हैं। गांवों के सेवकों के रूप में उन्हें सरकार की सेवा करनी पड़ती है और हिंदुओं की भी। इस सेवा के बदले उन्हें जमीनें दी जाती हैं। वे उनमें खेती करते हैं और उसकी उपज से अपनी जीविका चलाते हैं। अस्पृश्यों का एक कर्तव्य यह है कि वे गांवों में हिंदुओं के मृत पशुओं को उठाएं और उनकी खाल उतारें। यदि हिंदुओं के प्रति अस्पृश्य अपना कर्तव्य निभाने से इंकार कर दें, जो जिस भूमि से वे अपनी गुजर-बसर करते हैं, उसे जब्त किया जा सकता है। उन्हें दो में से एक को चुनना होता है कि या तो घिनौना कार्य करें या फिर भूखे मर जाएं।