अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
संकल्प संख्या 2 - 'मनुस्मृति' की प्रति को भस्म करने की घोषणा
इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि हिंदुओं के लिए संहिता के रूप में मान्य ‘मनुस्मृति' में जो नियम दिए गए हैं, और जिनकी घोषणा हिंदू कानून के निर्माता मनु के नाम से की जाती है, वे मानव मात्र को उसके अधिकारों से वंचित करते हैं और उसके व्यक्तित्व को रौंदते हैं। समूचे सभ्य जगत में मान्य मानव अधिकारों से उनकी तुलना करते हुए इस सम्मेलन की राय है कि इस 'मनुस्मति' का आदर नहीं होना चाहिए और उसे पवित्र पुस्तक भी नहीं कहा जाना चाहिए तथा उसके प्रति घोर घृणा और अनादर व्यक्त करने के लिए यह सम्मेलन उसकी एक प्रति को भस्म करने का संकल्प करता है। यह कार्य सम्मेलन की समाप्ति पर धर्म की आड़ में सामाजिक असमता को बनाए रखने वाली प्रथा के प्रतिरोध में होगा।
इन संकल्पों को सरसरी तौर पर देखने से ही पता चल जाएगा कि सम्मेलन ने किस नीति को अपनाया। भले ही सम्मेलन अन्याय - विशेष को दूर करने के लिए हुआ था, फिर भी उसने दिखा किया कि वह छोटे-मोटे अन्यायों के प्रतिकार से ही संतोष नहीं कर लेगा। सम्मेलन को लगा कि अब समय आ गया है कि अस्पृश्यों के लक्ष्य का निर्धारण किया जाए। निधारित लक्ष्य अति दूरगामी प्रभाव वाला है। सम्मेलन ने घोषणा की कि अस्पृश्य चाहते हैं कि हिंदू समाज - व्यवस्था में आमूल परिवर्तन हों। उसने घोषणा की कि इस पुननिर्माण का भवन निश्चय ही शास्त्रों की पुरानी नीवों पर खड़ा नहीं किया जाएगा। उसने घोषणा की कि नए आधारों का जो भी रूप हो, उनका सुर निश्चय ही हिंदू और हिंदू के बीच न्याय और साम्य के सुर से मिलना चाहिए। इस बारे में भी कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि उनके पुनर्निर्माण के मामले में वे हिंदू शास्त्रों की दुहाई की अनुमति नहीं देंगे। सम्मेलन ने न केवल उनका खंडन किया, बल्कि उसने तो उन्हें जलाकर भस्म भी कर दिया।
वह तो वाल्टेयर की उस निंदा की प्रतिध्वनि ही थी, जो उन्होंने कैथोलिक चर्च की अपने समय में की थी। पहली बार हिंदू समाज व्यवस्था के विरुद्ध यह आवाज उठाई गई कि वह ' कत्सित वस्तु के रूप में दयनीय' है। यह भी स्पष्ट है कि इन संकल्पों का स्वरूप नितांत क्रांतिकारी था।
हिंदू समाज-व्यवस्था को 'मनुस्मृति' की चट्टान पर खड़ा किया गया है। वह हिंदू धर्म ग्रंथों का अंश है। अतः वह सभी हिंदुओं के लिए पवित्र है। पवित्र होने के कारण वह अकाट्य और अजेय है। हर हिंदू उसे पवित्र मानता है और उसके आदेशों का पालन करता है। मनु न केवल जाति और अस्पृश्यता का समर्थन करता है, बल्कि उसे कानूनी मान्यता भी प्रदान करता है। 'मनुस्मृति' को भस्म करना असीम साहस का काम था। वह तो हिंदू धर्म के गढ़ पर ही प्रहार था। 'मनुस्मृति' में विसमता की भावना व्याप्त है और उसमें हिंदू जीवन-शैली तथा विचारधारा का आधार ठीक उसी प्रकार है, जिस प्रकार बेसिले फ्रांस में प्राचीन शासन व्यवस्था की भावना का प्रतीक था। 1927 में महाड में अस्पृश्यों द्वारा 'मनुस्मृति' की प्रति को जलाए जाने वाले वाली घटना का अस्पृश्यों के मुक्ति के इतिहास में वही महत्व तथा सार्थकता है, जो फ्रांस और यूरोप में जन-मुक्ति के इतिहास में बेसिले के पतन का था ।
स्वयं हिंदू समाज-व्यवस्था के ढांचे के विरुद्ध सीधी कार्यवाही की दूसरी मिसाल यह है कि अस्पृश्यों ने हिंदुओं के मृत पशुओं की खाल उतारने और उन्हें उठाने से इंकार कर दिया।
प्रायः अस्पृश्यों की निंदा इसलिए की जाती है कि अस्पृश्यता का अभिशाप तो उन्होंने स्वयं ओढ़ा है। इस आरोप का प्रमुख आधार यह बताया जाता है कि अस्पृश्यों ने यह धंधा अपनाया है कि वे हिंदुओं के मृत पशुओं का उठाते हैं, उनकी खाल उतारते हैं उनका सड़ा-गला मांस खाते हैं।