अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
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हिंदुओं का प्रतिरोध सोचा- समझा प्रतिरोध है। वे इस विद्रोह को हर हालत में दबा देना चाहते हैं। इसके लिए वे कुछ भी करने और किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार हैं। अस्पृश्यों के विद्रोह का जवाब हिंदुओं ने भी अपने आक्रमण के पत्थर से दिया है। अस्पृश्यों के इस विद्रोह का दमन हिंदुओं ने कितनी क्रूरता से किया है, वह एक दो उदाहरणों से स्पष्ट हो जाएगा।
सार्वजनिक स्थान से पानी लेने के अपने अधिकार को जताने के लिए महाड के चावदार तालाब पर जब अस्पृश्य गए तो उन पर हमला किया गया। अस्पृश्य सम्मेलन में भाग लेने के लिए आए थे और वे तालाब पर जाने वाले जुलूस में शामिल हुए थे। 'बोंबे क्रानिकल' में इस हमले का वर्णन इस प्रकार किया गया है:
जुलूस में अशांति का कोई चिह्न नहीं था और सब कुछ पूर्ण शांति से चल रहा था। लेकिन दो घंटे के बाद नगर के कुछ दुष्टमाना नेताओं ने यह गलत अफवाह उड़ा दी कि दलित वर्ग के लोग वीरेश्वर मंदिर में प्रवेश करने की योजना बना रहे हैं। इस पर डंडों से लैस दंगाइयों की भारी भीड़ इकट्ठा हो गई। शीघ्र ही भीड़ ने आक्रामक रवैया अपना लिया। तुरंत ही समूचा नगर उपद्रवियों का उफनता सागर-सा बन गया। लगता था, जैसे वे दलित वर्ग के लोगों के खून के प्यासें हों।
दलित वर्ग के लोग अपने-अपने गांवों को लौटाने से पूर्व भोजन कर रहे थे । जब उनमें से अधिकांश नगर से चले गए तो उपद्रवी उस रसोईघर में घुस गए, जहां दलित वर्ग के लोग खाना खा रहे थे। दोनों वर्गों के बीच घमासान संघर्ष छिड़ जाता, लेकिन दलित वर्गों को उनके नेताओं ने रोक दिया। अत: बहुत ही गंभीर दंगा टल गया। जब उपद्रवियों को उत्तेजना का कोई बहाना नहीं मिला तो वे मुख्य सड़क पर घूमने लगे और दलित वर्गों के उन इक्के-दुक्के जत्थों को मारने-पीटने लगे, जो अपने घरों को वापस लौट रहे थे। वे जबरदस्ती कई दलित वर्गों के लोगों के घरों में घुस गए और उन्होंने उनकी जमकर पिटाई की। अनुमान है कि कुल मिलाकर दलित वर्गों के लोगों का रवैया प्रशंसनीय था, वहां उच्च वर्गों के अनेक लोगों का रवैया अशोभनीय था । दलित वर्गों के एकत्रित लोगों की संख्या उच्च वर्गों के लोगों से बहुत अधिक थी। लेकिन उनके नेताओं का उद्देश्य था कि हर काम नितांत संवैधानिक तथा अहिंसात्मक ढंग से हो। अतः उन्होंने प्रयास किया कि दलित वर्ग के लोगों की ओर से कोई आक्रमण न हो। इसके लिए दलित वर्गों की जितनी प्रशंसा की जाए, वह थोड़ी है। भले ही उनके सामने उत्तेजना का पहाड़ था, उन्होंने अपना संयम बनाए रखा। महाड सम्मेलन ने बता दिया है कि उच्च वर्ग नहीं चाहते कि सार्वजनिक स्थानों से पानी लेने जैसे प्रारंभिक नागरिक अधिकार भी दलित वर्ग प्राप्त करें।
महाड और कोलाबा जिले के सवर्ण हिंदुओं के आचरण का सर्वाधिक निंदनीय पक्ष यह था कि तुरंत विभिन्न गांवों में संदेश भेजे गए और उच्च वर्ग के लोगों से कहा गया कि जैसे ही दलित वर्ग के प्रतिनिधि सम्मेलन से अपने - अपने गांव लौटें, उन्हें दंड दिया जाए। इस आदेश के अनुसार सम्मेलन के बाद अपने गांव पहुंचने से पूर्व या पहुंचने के बाद अनेक महारों पर हमला किया गया। वहां दलित वर्गों को यह घाटा है कि सवर्ण हिंदुओं के मुकाबले उनकी संख्या नहीं के बराबर है। दलित वर्गों के नेताओं ने अधिकारियों से सुरक्षा की अपील की है और जिला पुलिस अधीक्षक समेत जिला अधिकारी मौके पर जांच-पड़ताल कर रहे हैं। लेकिन यह कहना ही पड़ेगा कि यदि रेजीडेंट मजिस्ट्रेट दो घंटे के मूल्यवान समय तक हाथ पर हाथ धरकर न बैठा रहता तो संभव था कि दंगे की नौबत नहीं आती।
कालाराम मंदिर सत्याग्रह के कारण अस्पृश्यों पर जो हमला किया गया, वह भी कम गंभीर नहीं था ।