मुख्य मजकुराकडे जा

अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट -  लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 50 of 52
18 ऑक्टोबर 2023
Book
5,,7,1,13,,

IV

     तीसरी अड़चन जो अस्पृश्यों की असहाय स्थिति को विकट बनाती है, वह यह है कि अस्पृश्यों के लिए यह संभव नहीं कि वे पुलिस से सुरक्षा और अदालतों से न्याय प्राप्त कर सकें। पुलिस से लोग सवर्ण हिंदुओं के वर्गों से भरती किए जाते हैं। मजिस्ट्रटों के पद पर भी सवर्ण हिंदुओं के लोग होते हैं। पुलिस और मजिस्ट्रेटों के वर्ग से सवर्ण हिंदुओं का नाता सगे-संबंधी जैसा है। अस्पृश्यों के प्रति वे भी सवर्ण हिंदुओं की भांति भावनाओं और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त रहते हैं। यदि कोई अस्पृश्य किसी पुलिस अधिकारी के पास सवर्ण हिंदू के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने जाता है तो सुरक्षा के स्थान पर उसे ढेर सारी गालियां सुननी पड़ती हैं। यह तो उसे शिकायत दर्ज किए बिना ही भगा दिया जाता है या रिपोर्ट ऐसी झूठी दर्ज की जाती है कि उसमें स्पृश्य हमलावरों को बच निकलने का मार्ग मिल जाता है। यदि वह मजिस्ट्रेट की अदालत में अपराधियों के खिलाफ मुकदमा दायर करता है तो उस पर क्या कार्रवाई होगी, यह पहले ही मालूम हो जाता है। किसी अस्पृश्य को कोई हिंदू गवाही देने के लिए नहीं मिलेगा, क्योंकि गांव में पहले ही षडयंत्र रच दिया जाता है कि कोई भी अस्पृश्य की हिमायत नहीं करेगा, चाहे सच कुछ भी क्यों न हो। यदि वह गवाह के रूप में अस्पृश्यों को पेश करता है तो मजिस्ट्रेट उनकी गवाही स्वीकार नहीं करेगा, क्योंकि वह आसानी से कह देगा कि वह तो उसी का हितैषी है, इसलिए उसे स्वतंत्र गवाह नहीं कहा जा सकता। यदि वे स्वतंत्र गवाह हैं भी तो मजिस्ट्रेट के सामने एक आसान - सी तरीका यह कह देना है कि उसे अस्पृश्य के पक्ष में गवाह सच्चा नहीं प्रतीत होता । वह निडर होकर ऐसा फैसला सुना देगा, क्योंकि वह भली-भांति जानता है कि उसके ऊपर कोई अदालत उसके इस फैसले को नहीं बदलेगी, क्योंकि यह एक स्थापित नियम है कि अपील सुनने वाली अदालत मजिस्ट्रेट के फैसले में दखल न दे, जो गवाहियों पर आधारित है और जिनकी उसने जांच की है। इस तथ्य को तो अब अस्पृश्यों के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने भी स्वीकार कर लिया है।

upper caste Hindus and untouchables asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact dr Bhimrao Ramji Ambedkar

     'हिंदू' के 7 मार्च, 1938 के अंक में प्रकाशित 30 सितंबर 1937 को समाप्त होने वाले वर्ष के लिए तमिलनाडु हरिजन सेवक संघ की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है:

    दूरदराज के गांवों में इन अधिकारों ने हरिजनों की राजनीतिक चेतना को तो जगाया है, पर वहां हरिजन के लिए सदैव ऐसा करना संभव नहीं है। वहां तो केवल पुलिस वालों का राज  चलता है। वहां हरिजन द्वारा अपने अधिकारों पर आग्रह किए जाने का अर्थ है कि उसके और सवर्णों के बीच संघर्ष होगा और संघर्ष में सदा ही सवर्ण का पलड़ा भारी रहता है। इस संघर्ष का स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि पुलिस या मजिस्ट्रेट के पास शिकायत की जाएगी। मजिस्ट्रेट के पास जाना हरिजन के बूते से बाहर है और पुलिस में शिकायत करने का नतीजा और भी खराब होगा। अनेक मामलों में इन शिकायतों की कभी कोई जांच नहीं होती। कई अन्य मामलों में सदा सवर्णों के पक्ष में फैसला दर्ज किया जाता है। पुलिस में हमने जो शिकायतें कीं, उनका भी यही परिणाम हुआ। हमें समस्या यह दीख पड़ती है कि पुलिस के निचले कर्मचारियों की मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है। या तो वे हरिजन के अधिकारों से नावाकिफ हैं, जिनकी रक्षा करने की उनसे अपेक्षा होती है या वे सवर्णों के प्रभाव में आ जाते हैं। यह भी संभव है कि वह नितांत उदासीन रहते हैं। अन्य मामलों में धनी द्वारा सवर्ण की तरफदारी भ्रष्टाचारवश की जाती है।

    इसका अर्थ है कि अधिकारी अस्पृश्य-विरोधी और हिंदू-समर्थक होता है। जब भी उसे अपने किसी अधिकार या विवेक का प्रयोग करना होता है, तो वह उसका प्रयोग पूर्वाग्रह से अस्पृश्य के विरुद्ध करता है।

    पुलिस कर्मचारी और मजिस्ट्रेट अक्सर भ्रष्ट होते हैं। यदि वे केवल भ्रष्ट हों तो स्थिति संभवतः उतनी खराब न हो, क्योंकि भ्रष्ट अधिकारी को तो कोई भी पक्ष खरीद सकता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पुलिस कर्मचारी या मजिस्ट्रेट भ्रष्ट होने की अपेक्षा अधिक पक्षपातपूर्ण होते हैं। हिंदुओं के प्रति उनके इस पक्षपातपूर्ण और अस्पृश्यों के प्रति विरोधपूर्ण रवैय के कारण ही अस्पृश्यों को न्याय और सुरक्षा नहीं मिल पाती। एक के प्रति पक्षपात और दूसरे के प्रति विरोध का कोई निदान नहीं है, क्योंकि यह सामाजिक और धार्मिक नफरत की भावना पर आधारित है, जो हर हिंदू में जन्मजात होती है। पुलिस तथा मजिस्ट्रेट को अपनी प्रेरणाओं, अपने हितों और संस्कारों के कारण अस्पृश्यों की भावनाओं के साथ सहानुभूति नहीं होती। वे उस अभाव, पीड़ा, लालसा और इच्छाओं से अनुप्राणित नहीं होते, जो अस्पृश्यों को उद्वेलित किए रहती हैं। इसके फलस्वरूप वे लोग अस्पृश्यों की आकांक्षाओं के प्रति खुलकर विरोधी और विद्वेषपूर्ण हो जाते हैं, उन्हें आगे नहीं बढ़ने देते, उनके ध्येय हित की उपेक्षा करते हैं और ऐसी हर चीज को काट देते हैं, जिसमें अस्पृश्यों को गर्व और आत्म-सम्मान मिल सके। दूसरी ओर, वे हिंदुओं का उनके हर काम में साथ देते हैं, उनके साथ पूरी सहानुभूति रखते हैं, जिससे उनकी शक्ति, क्षमता, मान-मर्यादा और प्रतिष्ठा बनी रहे । जब कभी इन दोनों में संघर्ष होता है, तब वे अस्पृश्यों के इस विद्रोह को कुचलने में हिंदुओं के एजेंट के रूप में कार्य करते हैं और खुलेआम निर्लज्ज होकर हिंदुओं के हर घिनौने काम में हर संभव उचित - अनुचित सहायता भी देते हैं, जिससे अस्पृश्यों को उनकी करनी का फल चखाया जा सके और वे ऊपर उठने न पाएं।

    इसका सबसे अधिक बुरा पक्ष यह है कि यह सब अन्याय और अत्याचार कानून की सीमाओं के अंदर किया जा सकता है। कोई हिंदू यह साफ तौर पर कह सकता है कि वह किसी भी अस्पृश्य को काम पर नहीं लगाएगा, उसे कोई चीज नहीं बेचेगा, उसे अपने खेतों से बेदखल कर देगा और किसी कानून को तोड़े बिना भी वह उसके मवेशियों को अपने खेतों से होकर नहीं जाने देगा। ऐसा करके वह अपने अधिकार का ही इस्तेमाल कर रहा है। कानून इसकी परवाह नहीं करता कि उसकी मंशा क्या है। कानून यह नहीं देखता कि इससे उस अस्पृश्य को कितनी हानि हो रही है। पुलिस अपनी शक्ति और अपने अधिकार का दुरुपयोग कर सकती है। पुलिस अधिकारी ऐसी बात को दर्ज कर सकता है जो कही ही नहीं गई या ऐसा बात को दर्ज कर, जो की गई बात से नितांत भिन्न हो जान-बूझकर अपने रिकार्ड तोड़-मरोड़ सकता है। वह उस पक्ष को गवाहों के नाम-पते आदि बता सकता है, जिसमें उसका स्वार्थ होता है। वह किसी को गिरफ्तार करने से इंकार कर सकता है। वह किसी मामले को खत्म करने के लिए कुछ भी कर सकता है। वह यह सब काम पकड़े जाने के डर के बिना कर सकता है। कानून में बहुत-सी कमियां हैं और वह इन कमियों को अच्छी तरह जानता है। मजिस्ट्रेट ने से अपने विवेक का इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह छूट दे रखी है। वह उसका इस्तेमाल करने के लिए पूरी तरह आजाद है। किसी भी मामले का निर्णय गवाहों पर निर्भर करता है, जो गवाही दे सकते हैं। लेकिन मुकदमे का निर्णय इस बात पर निर्भर करता है कि क्या गवाहियां विश्वसनीय हैं या नहीं। यह मजिस्ट्रेट पर निर्भर करता है कि वह किस पर विश्वास और किस पर अविश्वास करता है। वह किसी भी पक्ष पर विश्वास करने के लिए पूर्ण स्वतंत्र है और वह जो कुछ करता है, वह उसका अपना विवेक होता है और कोई भी उसके इस विवेक का इस्तेमाल करने में दखल नहीं कर सकता। ऐसे बहुत से मामले हैं, जिनमें मजिस्ट्रेट ने अपने विवेक का इस्तेमाल अस्पृश्यों के हितों के खिलाफ किया है। अस्पृश्यों की गवाहियां चाहे कितनी भी सच्ची क्यों न हों, मजिस्ट्रेट सभी लोगों में एक ही बात कह देता है, 'मुझे गवाहों पर विश्वास नहीं है', और किसी ने भी उसके इस विवेकाधिकार को चुनौती नहीं दी है। कौन-सी सजा सुनाई जाए, यह भी मजिस्ट्रेट का विवेकाधिकार है। कुछ ऐसे भी निर्णय होते हैं, जिनके खिलाफ अपील की जा सकती है। अगर उचित न्याय नहीं हुआ है तो उचित न्याय पाने का रास्ता यही अपील होती है। मजिस्ट्रेट द्वारा यह कह दिया जाता है कि इस मामले में दिए गए निर्णय के खिलाफ अपील नहीं हो सकती।

    ये हैं वे ताकतें जो संघर्षशील अस्पृश्यों के विरुद्ध काम कर रही है। उन पर विजय प्राप्त करने का कोई मार्ग है ही नहीं, क्योंकि एक ऐसे समूचे समाज को दंडित करने का कोई तरीका नहीं है, जो संगठित रूप से कानून को धता बताने पर तुला हुआ हो ।

 

V

     निश्चय ही इन कठिनाइयों पर पूर्णतः विजय तो प्राप्त नहीं की जा सकती, पर उन्हें कम करने का एक मार्ग अस्पृश्यों के लिए खुला वह है, राजनीति और राजनीतिक सत्ता के प्रभावी प्रयोग का मार्ग। लेकिन इस मामले में अस्पृश्यों का प्रयास विफल कर दिया गया है।