अस्पृश्य का विद्रोह, गांधी और उनका अनशन, पूना पैक्ट - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Asprishy ka vidroh Gandhi aur Unka anshan Poona pact Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
II
‘धर्म' शब्द संस्कृत भाषा से उपजा है। यह भी उन संस्कृत शब्दों में से एक है, जो किसी निश्चित परिभाषा के सभी प्रयासों का उल्लंघन करते हैं। प्राचीन काल में इस शब्द का उपयोग विभिन्न अर्थों में होता था, भले ही वे समानार्थी लगते थे। यह देखना रुचिकर होगा कि किस प्रकार 'धर्म' शब्द अर्थ- संक्रमणों¹ से होकर गुजरा है। लेकिन यह उसके लिए उपयुक्त अवसर नहीं है। इतना कहन पर्याप्त होगा कि शीघ्र ही 'धर्म' ने एक निश्चित अर्थ धारण कर लिया और उसके अर्थ के बारे में कोई संशय नहीं रह गया। ‘धर्म' शब्द का अर्थ है, हिंदू समाज के सदस्य के रूप में, किसी एक जाति के सदस्य के रूप में, और जीवन की किसी विशिष्ट अवस्था में व्यक्ति के रूप में किसी व्यक्ति के विशेषाधिकार, कर्तव्य तथा दायित्व और उसके आचरण का स्तर।
1. देखिए, पी.वी. काणे, हिस्ट्री ऑफ धर्म-शास्त्र, पृ. 1-2
सभी हिंदू मानते हैं कि धर्म के प्रमुख स्रोत हैं- वेद, स्मृति और रीति-रिवाज । लेकिन जहां तक धर्म का संबंध है, वेदों तथा स्मृतियों में एक अंतर है। धर्म के जिन विकसित नियमों को हम देखते हैं, निश्चय ही उनके मूलाधार वेदों में हैं। अतः यह कहना उचित है कि वेद धर्म के स्रोत हैं। लेकिन वेद नहीं कहते कि वे धर्म पर औपचारिक ग्रंथ हैं। धर्म के मामलों पर उनमें सिलसिलेवार निश्यचात्मक विधियां (आदेश) नहीं हैं। धर्म संबंधी कतिपय मामलों के बारे में उनमें केवल असंबद्ध उदगार हैं। दूसरी ओर, स्मृतियां धर्म के बारे में औपचारिक ग्रंथ हैं। धर्म के बारे में उनमें कानून हैं। कानून के सही अर्थ में उन्होंने धर्म के कानून का रूप धारण किया है। यदि इस बारे में कोई विवाद हो कि क्या धर्म है और क्या अधर्म है, तो उसका फैसला स्मृति में दिए गए नियम के पाठ के संदर्भ मे ही किया जा सकता है। अतः हिंदू जिसे धर्म कहते हैं, उसका वास्तविक स्रोत स्मृतियां हैं। चूंकि धर्म और अधर्म का निर्णय करने में उन्हें प्रमाण माना जाता है, अतः स्मृतियों को धर्म के नियम निर्धारित करने वाले धर्म-शास्त्रों की संज्ञा दी गई है।
प्राचीन काल से परंपरा से जो स्मृतियां चली आ रही हैं, उनकी संख्या के बारे में अलग-अलग अनुमान हैं। इनकी कम से कम संख्या पांच है और अधिक से अधिक एक सौ । ध्यान देने योग्य महत्व की बात यह है कि जहां तक प्रमाण का संबंध है, ये सभी स्मृतियां समान नहीं हैं। उनमें से अधिकांश अस्पष्ट हैं। उनमें से केवल कुछ को इतना प्रामाणिक समझा गयाकि उन पर लेखक भाष्य एवं टीकाएं लिख सकें। यदि किसी स्मृति के महत्व को इस कसौटी पर परखा जाए कि उसका भाष्य किया गया है या नहीं, तो उसके आधार पर जिन स्मृतियों को उच्च स्तरीय और प्रामाणिक कहा जा सकेगा, वे हैं, 'मनुस्मृति', 'याज्ञवल्क्य स्मृति' और 'नारद स्मृति। इन स्मृतियों में 'मनुस्मृति' का स्थाना सर्वोपरि है। वह उत्कृष्ट रूप में संपूर्ण धर्म का स्रोत है।
यदि यह जानना है कि वह कौन-सा धर्म है जिसके लिए हिंदू अस्पृश्यों से लड़ने-मरने के लिए तैयार हो जाता है, तो हमें स्मृतियों के नियमों को, खासकर 'मनुस्मृति' के नियमों की जानकारी हासिल करनी ही होगी। इन नियमों के कुछ ज्ञान के बिना अस्पृश्यों के विद्रोह के प्रति हिंदुओं की प्रतिक्रिया को समझना संभव नहीं होगा। अपने प्रयोजन के लिए यह जरूरी नहीं है कि हम स्मृतियों में वर्णित धर्म के समूचे क्षेत्र की छानबीन उसकी सभी शाखाओं - प्रशाखाओं सहित करें। धर्म की उस शाखा को जान लेना काफी होगा, जिसे आधुनिक शब्दावली में स्वीय विधि (पर्सनल ला) कहा जाता है या आम भाषा में कहें तो धर्म का वह अंग जिसका संबंध हैसियत पर आधारित अधिकार, कर्तव्य या क्षमता से है।
अतः मैं नीचे ‘मनुस्मृति' से कुछ जरूरी मूलपाठों का उद्धरण देना चाहूंगा। उनसे भली-भांति पता चल जाएगा कि मनु ने कैसे समाज संगठन को मान्यता दी है और अपनी समाज-व्यवस्था में शामिल विभिन्न वर्गों के लिए क्या-क्या अधिकार तथा कर्तव्य निर्धारित किए हैं।
'मनुस्मृति' में वर्णित समाज व्यवस्था को समुचित रूप से नहीं आंका गया है। अतः सावधान कर देना जरूरी है, ताकि गलतफहमी की गुंजाइश न रहे। आम तौर पर कहा भी और माना भी जाता है कि मनु ने चातुर्वर्ण्य नामक समाज-व्यवस्था निर्धारित की है। चातुर्वर्ण्य उस समाज व्यवस्था का तकनीकी नाम है, जिनमें सभी व्यक्तियों को चार अलग-अलग वर्णों में बांटा गया है। अनेक लोगों की यह धारणा है। कि मनु द्वारा निर्धारित धर्म में बस इतनी ही व्यवस्था की गई है। यह एक गंभीर भूल है। यदि इसे ठीक न किया जाए तो निश्चय ही इससे उस बारे में गंभीर गलतफहमी पैदा हो सकती है, जिसे मनु ने वस्तुतः निर्धारित किया है और जो मनु विचार में आदर्श समाज-व्यवस्था है।
मेरे विचार में यह मनु के बारे में नितांत गलत आकलन है। यह स्वीकार करना होगा कि चातुर्वर्ण्य में शामिल चार वर्णों में समाज के विभाजन को मनु ने प्रमुखता नहीं दी है। एक दृष्टि से मनु ने इस विभाजन को गौण माना है। उसकी दृष्टि में यह केवल उन लोगों के बीच 'आपसी' व्यवस्था है, जिसे चातुर्वर्ण्य में शामिल किया गया है। अनेक लोगों की दृष्टि में मुख्य बात यह नहीं है कि कोई व्यक्ति ब्राह्मण है या क्षत्रिय, वैश्य है अथवा शूद्र । वह विभाजन तो उनसे पूर्व भी मौजूद था। मनु ने तो इस विभाजन का विस्तार किया है, उसे सुदृढ़ किया और उसका स्तरीकरण किया। विभाजन का सूत्रपात उसने नहीं किया। लेकिन मनु ने एक नए विभाजन का सूत्रपात अवश्य किया। वह विभाजन उन लोगों के बीच है (1) जो चातुर्वर्ण्य की परिधि में हैं, और (2) जो चातुर्वर्ण्य की परिधि के बाहर हैं। यह नया समाज - विभाजन मनु की मौलिकता है। हिंदुओं के प्राचीन धर्म में यह उसकी अभिवृद्धि है। मनु की दृष्टि में यह विभाजन बुनियादी है, क्योंकि पहले उसने ही इसे लागू किया और अपने अधिकार के ठप्पे से उसे मान्यता प्रदान की।
अतः इस विषय से संबद्ध मूलपाठों के दो शीषर्क के अधीन रखना ही होगा (1) उन लोगों से संबद्ध मूलपाठ जो चातुर्वर्ण्य की परिधि में हैं, और (2) उन लोगों से संबद्ध मूलपाठ जो चातुर्वर्ण्य की परिधि में नहीं हैं।